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  • राम साहित्य कोश : खंड 1-2 - योगेन्द्र प्रताप सिंह

    राम साहित्य कोश : खंड 1-2 – योगेन्द्र प्रताप सिंह

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    राम साहित्य कोश : खंड 1-2 – योगेन्द्र प्रताप सिंह

    राम साहित्य कोश : खंड 1-2

    योगेन्द्र प्रताप सिंह

    यह कोश केवल एक सन्दर्भ कोश मात्र नहीं है। यह समग्र भारत की राष्ट्रीय रागात्मक एकता का स्वयं में बृहत्तर तथा व्यापक साक्ष्य है। आप कल्पना करें, उस कालखंड की, जब भारत की समृद्धि एवं अखंडता पर विदेश हमले शुरू हुए। प्रारम्भिक स्थिति में शक, हूण, किरात, खास आभीर, यूनानी शक्तियों के भारत पर हमले हुए, जिनमें से कुछ तो भाग गए और कुछ हम भारतीयों के बीच रहते हुए पूरी तरह से भारतीय बन गए। इन सबके बावजूद, हमारा अपना भारत अभी तक अपनी इसी सांस्कृतिक अडिगता का साक्ष्य है।

    लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद, हमारी सांस्कृतिक धरोहर देश की अस्मिता के ध्वज को एक बार फिर विश्वमंच पर फहराने लगी है और इसी आशा के साथ, आज समग्र भारत में शतियों-शतियों से सांस्कृतिक धरोहर बनी यह रामकथा ‘राम साहित्य कोश’ के रूप में आपके सामने रखी जा रही है। इस साहित्य कोश का उद्देश्य केवल भारतीयों के सामने समीक्षा कोश की प्रस्तुति का लक्ष्य नहीं है, अपितु इसके द्वारा यह सिद्ध करना लक्ष्य है कि राष्ट्रीय स्तर पर यह भारतीय संस्कृति, त्याग एवं शीलवादी आस्था बनकर हज़ारों-हज़ारों वर्षों से संचित आर्य संस्कारों की थाती हमें गहन-से-गहन संकटों में कैसे जीवित रहने के लिए संजीवनी शक्ति देती आ रही है। राम साहित्य कोश की इस प्रस्तुति का मन्तव्य भी यही है कि हम एक बार फिर अपनी भारतीय संस्कृति के त्यागवाद, परोपकारवाद, आस्थावादी अस्मिता को सबके सामने प्रस्तुत करके उन्हें इन मूल्यों से जोड़ने के लिए पुनः प्रेरित करें।

    पृष्ठ-798 रु2000

    2,000.00
  • साहित्यमुखी - रामधारी सिंह ‘दिनकर’

    साहित्यमुखी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

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    साहित्यमुखी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

    साहित्यमुखी

    रामधारी सिंह ‘दिनकर’

    साहित्य में निबन्धों की अपनी एक विशिष्ट क़िस्म की प्रमुखता रही है। यही कारण है कि गद्य की इस तार्किक और बौद्धिक विवेचना वाली विधा में हिन्दी के कालजयी साहित्यकार रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के निबन्ध अपने उद्देश्य में आज भी ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं।

    ‘साहित्यमुखी’ साहित्य की विभिन्न विधाओं और समस्याओं को समर्पित चिन्तनपूर्ण निबन्धों का संग्रहणीय श्रेष्ठ संकलन है जिसमें शामिल कई निबन्ध दिनकर के ओजस्वी वक्ता होने के प्रमाण और मिसाल हैं।

    इन पठनीय और मननीय निबन्धों में प्रस्तुत हैं–‘आधुनिकता और भारत-धर्म’, ‘कविता में परिवेश और मूल्य’, ‘आधुनिकता का वरण’, ‘साहित्य में आधुनिकता’, ‘युद्ध और कविता’ जिन पर दिनकर के चिन्तन-जन्य विचार हैं तो वहीं गांधी, निराला, केशवसुत, टाल्स्टाय, शेक्सपियर और इलियट के प्रति आदरांजलि के साथ विचारोत्तेजक निबन्ध ‘शीर्षकमुक्त चिन्तन’ भी संकलित है।

    ‘साहित्यमुखी’ दिनकर की एक विशिष्ट विचारप्रधान कृति है।

    पृष्ठ-200 रु695

    695.00
  • साहित्य, समाज और जीवन - रविनन्दन सिंह

    साहित्य, समाज और जीवन – रविनन्दन सिंह

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    साहित्य, समाज और जीवन – रविनन्दन सिंह

    साहित्य, समाज और जीवन

    रविनन्दन सिंह

    ‘साहित्य, समाज और जीवन’ रविनन्दन सिंह का दूसरा निबन्‍ध-संग्रह है। इसमें अधिकतर निबन्ध साहित्यिक हैं। लगभग एक दर्जन निबन्ध समाज के विविध पहलुओं तथा सामाजिक विसंगतियों पर केन्द्रित हैं। कुछ निबन्‍ध मनुष्य की जीवन शैली तथा जीवन-दर्शन से सम्‍बन्धित हैं।

    रविनन्दन सिंह जब कोई विषय चुनते हैं तो उस विषय की गहन पड़ताल करते हैं एवं उस विषय की परतों को खोलकर रख देते हैं। वे विषय का विश्लेषण तथा मूल्यांकन बिना किसी आग्रह के, निरपेक्ष होकर करते हैं। उनके निबन्धों को पढ़ने से उस विषय की तस्वीर बिलकुल स्पष्ट हो जाती है। वे विषय को उलझाते नहीं बल्कि उलझे हुए विषय को भी सुलझाकर प्रस्तुत करते हैं। उनके निबन्धों की भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहपूर्ण है। उनके निबन्‍ध अत्यन्त सारगर्भित एवं बोधगम्य हैं। भाषा एवं संवेदना से समृद्ध इन निबन्धों से गुज़रना एक रोचक अनुभव की तरह है। स्नातक, स्नातकोत्तर के विद्यार्थियों एवं शोध-छात्रों के लिए ये निबन्ध अत्यन्‍त उपयोगी सिद्ध होंगे।

    पृष्ठ-240 रु500

    500.00
  • वाचिकता - वंदना टेटे

    वाचिकता – वंदना टेटे

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    वाचिकता – वंदना टेटे

    वाचिकता

    वंदना टेटे

    पृष्ठ-152 रु150

    150.00
  • गहराइयाँ और ऊंचाइयाँ - श्याम मनोहर

    गहराइयाँ और ऊंचाइयाँ – श्याम मनोहर

    199.00
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    गहराइयाँ और ऊंचाइयाँ – श्याम मनोहर

    गहराइयाँ और ऊंचाइयाँ

    श्याम मनोहर

    “रजा पुस्तक माला की यह कोशिश है कि हिन्‍दीतर भारतीय भाषाओँ के लेखक क्या लिख-सोच रहे हैं, उसका महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक हिस्सा हिन्‍दी में प्रकाशित किया जाए। इसी प्रयत्न के अन्‍तर्गत मराठी लेखक-नाटककार के आलोचनात्मक लेखन के एक संचयन का हिन्‍दी-मराठी विद्वान निशिकान्त ठकार द्वारा किया गया अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है। हमें उम्मीद है कि ऐसी सामग्री से हिन्‍दी के विचार और आलोचनात्मक चिन्‍तन का परिसर विस्तृत और समृद्ध होगा।”

    –अशोक वाजपेयी

    पृष्ठ-201 रु199

    199.00
  • हिन्दी साहित्य और नारी समाज - डॉ. नागरत्ना राव

    हिन्दी साहित्य और नारी समाज – डॉ. नागरत्ना राव

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    हिन्दी साहित्य और नारी समाज – डॉ. नागरत्ना राव

    हिन्दी साहित्य और नारी समाज

    डॉ. नागरत्ना राव

    संसार के समस्त प्राणियों में ‘स्त्री’ मानव समाज की अपनी दुनिया है। यह जानने, समझने के बावजूद स्त्री घर के भीतर और बाहर समाज में उपेक्षित, अपमानित और प्रताड़ित होती रही है। कभी उसने प्रतिरोध किया तो कभी विरोध। हर हाल में झेलना स्त्री को ही पड़ा है। कभी परिस्थितियों की प्रतिकूलता ने उसे संघर्षमय बनाया तो कभी अपनों की अनाकुलता के कारण उसे विषमताओं को झेलना पड़ा। यदि वह उनसे उभरती तो कोई न कोई कलंक उसे कलुषित करता। मानो स्त्री कोई वस्तु है, जिसे प्रत्येक स्तर पर अपने आपको ढालना है। स्त्री, स्त्री है तभी वह ऐसा करने में सक्षम है। नारी मानव समाज का अभिन्न अंग है। समाज की ही भाँति साहित्य में भी नारी को लेकर कई विचारधाराएँ हैं। समय चाहे कोई भी रहा हो नारी के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। परिणामस्वरूप समय-समय पर नारी की स्थिति में परिवर्तन आया। सामाजिक रूप से नारी की स्थिति में आए परिवर्तन का प्रभाव हिन्दी साहित्य पर भी पड़ा, क्योंकि साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब होता है। साहित्य मानव जीवन की ही प्रतिछाया है। समाज में नारी की गतिविधियों, चित्तवृत्तियों के अनुरूप हिन्दी साहित्य में भी नारी का चित्रण मिलता है। इस पुस्तक में नारी की सामाजिक और साहित्यिक स्वरूप को समझने और समझाने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक समाज और साहित्य दोनों दृष्टियों से नारी के स्वरूप को एकत्र करने का सत्प्रयत्न है।

    पृष्ठ-116 रु300

    300.00
  • हिन्दी साहित्य का समग्र इतिहास - रामकिशोर शर्मा

    हिन्दी साहित्य का समग्र इतिहास – रामकिशोर शर्मा

    700.00
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    हिन्दी साहित्य का समग्र इतिहास – रामकिशोर शर्मा

    हिन्दी साहित्य का समग्र इतिहास

    रामकिशोर शर्मा

    हिन्दी साहित्य का समग्र इतिहास’ पुस्‍तक नए अनुसन्‍धानों, विमर्शों के परिप्रेक्ष्य में समाज सापेक्षता तथा कला-मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत की गई है। इसमें हिन्‍दी भाषी प्रान्तों के अलावा अन्य प्रान्तों में रहनेवाले, हिन्दीतर भारतीय भाषाओं के प्रयोक्ता लेखकों एवं कवियों की रचनाओं को समाहित किया गया है।

    नई विधाओं जैसे हिन्दी गज़ल, नवगीत, अनुगीत, हाइकू के रचना-शिल्प पर समुचित प्रकाश डाला गया है।

    स्वतंत्रता के बाद के ऐसे रचनाकारों की रचनाओं पर विचार किया गया है जो आन्दोलनों से न जुड़कर स्वतंत्र लेखन कर रहे थे। रचनाकारों तथा रचनाओं का मूल्यांकन दुराग्रहमुक्त होकर निष्पक्ष भाव से किया गया है।

    हिन्दी और उर्दू का गहरा रिश्ता है, अतः हिन्दी के अध्येताओं को उर्दू साहित्य से भी परिचित होना चाहिए, इसी दृष्टि से उर्दू साहित्य का अति संक्षिप्त इतिहास दर्शाया गया हैं। समकालीन अनेक रचनाओं को शामिल किया गया है जो साहित्यिक दृष्टि से उत्कृष्ट हैं किन्तु साहित्येतिहासों में जिनकी उपेक्षा की गई है। आधुनिक युग  में ब्रज तथा अवधी साहित्य की प्रवृत्‍त‍ियों पर प्रकाश डाला गया है। विवेचन की भाषा-शैली स्पष्ट, सुबोध तथा निष्पक्ष है। हिन्दी साहित्य के समग्र इतिहास में काव्य-प्रवृतियों का अभिनव दृष्टि से मूल्यांकन किया गया है। नए विमर्शों तथा पुनर्पाठ की दृष्टि से नई सामग्री का समावेश भी किया गया है। हिन्दी ग़ज़ल, हाइकू, बोलियों के साहित्य को भी यथास्थान अंकित किया गया है।

    पृष्ठ-487 रु700

    700.00
  • आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास - बच्चन सिंह

    आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास – बच्चन सिंह

    500.00
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    आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास – बच्चन सिंह

    आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास

    बच्चन सिंह

    आधुनिक युग इतनी तेजी से बदल रहा है कि साहित्य के बदलाव से भी उसे समझा जा सकता है। इस बदलाव को, क्षिप्रतर बदलाव को साहित्य और इतिहास दोनों के संदर्भों में एक साथ पकड़ना ही इतिहास है। यह पकड़ तब तक विश्वसनीय नहीं हो सकती जब तक समसामयिक अखबारी साहित्य को श्रेष्ठ भविष्योन्मुखी साहित्य से अलगाया न जाय। प्रत्येक युग का आधुनिक काल ऐसे साहित्य से भरा रहता है जो साहित्येतिहास के दायरे में नहीं आता। किन्तु यह जरूरी नहीं है कि हम अपने इतिहास के लिए ग्रंथों का जो अनुक्रम प्रस्तुत करेंगे वह कल भी ठीक होगा, अपरिवर्तनीय होगा।

    इस नये संस्करण में कुछ पुरानी बातों को बदल दिया गया है और नये तथ्यों के आधार पर उनका नया अर्थापन किया गया है। इस संस्करण को अद्यतन बनाने के लिए बहुत सारे लेखकों, कवियों और रचनाकारों को भी सम्मिलित कर लिया गया है अब यह अद्यतन रूप में आपके सामने है।

    पृष्ठ-395 रु500

    500.00
  • आधुनिक साहित्य : मूल्य और मूल्याकंन - डॉ निर्मला जैन

    आधुनिक साहित्य : मूल्य और मूल्याकंन – डॉ निर्मला जैन

    395.00
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    आधुनिक साहित्य : मूल्य और मूल्याकंन – डॉ निर्मला जैन

    आधुनिक साहित्य : मूल्य और मूल्याकंन

    डॉ निर्मला जैन

    रचना और आलोचना की सतत् विकासमान प्रक्रिया युग-सापेक्ष सही मूल्यों का निर्धारण करती है तथा उन सार्थक प्रतिमानों का निर्माण करती चलती है जो साहित्य के मूल्यांकन को दिशा और गति देते हैं। इस दृष्टि से देखें तो डॉ. निर्मला जैन की यह पुस्तक अपना विशेष महत्त्व रखती है। इसमें ‘मूल्य’ और ‘मूल्यांकन’ के ही बिन्दुओं पर आधुनिक साहित्य की रचनात्मकता और आलोचनात्मकता के प्रश्नों को बारीकी और संजीदगी से उठाया गया है।

    ‘आधुनिक साहित्य : मूल्य और मूल्याकंन’ आलोचनात्मक निबन्धों का एक सुनियोजित उपयोगी संकलन है। समय-समय पर लिखे गए अपने इन निबन्धों में डॉ. जैन ने बहुत ही धारदार शैली में साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों और समस्याओं का वैचारिक विश्लेषण किया है। अनेक ऐसे मुद्‌दों को उन्होंने यहाँ नए आयाम दिए हैं जो बहसों के दौरान आए दिन बार-बार सामने आते रहे हैं। साथ ही, कविता और कथा के क्षेत्रों में अब तक की विशिष्ट उपलब्धियों को भी उन्होंने नए कोणों से देखा-परखा और रेखांकित किया है। संक्षेप में, यह पुस्तक रचना और आलोचना की सही पहचान कराने में सक्षम है।

    पृष्ठ-144 रु395

    395.00
  • आधुनिक साहित्य की प्रवृतियाँ - नामवर सिंह

    आधुनिक साहित्य की प्रवृतियाँ – नामवर सिंह

    225.00
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    आधुनिक साहित्य की प्रवृतियाँ – नामवर सिंह

    आधुनिक साहित्य की प्रवृतियाँ

    नामवर सिंह

    डॉ. नामवर सिंह हिन्दी आलोचना की वाचिक परम्परा के आचार्य कहे जाते थे। जैसे बाबा नागार्जुन घूम-घूमकर किसानों और मज़दूरों की सभाओं से लेकर छात्र-नौजवानों, बुद्धिजीवियों और विद्वानों तक की गोष्ठियों में अपनी कविताएँ बेहिचक सुनाकर जनतांत्रिक संवेदना जगाने का काम करते रहे, वैसे ही नामवर जी घूम-घूमकर वैचारिक लड़ाई लड़ते करते रहे; रूढ़िवादिता, अन्धविश्वास, कलावाद, व्यक्तिवाद आदि के ख़‍िलाफ़ चिन्तन को प्रेरित करते रहे; नई चेतना का प्रसार करते रहे। इस वैचारिक, सांस्कृतिक अभियान में नामवर जी एक तो विचारहीनता की व्यावहारिक काट करते रहे, दूसरे वैकल्पिक विचारधारा की ओर से लोकशिक्षण भी करते रहे।

    नामवर जी मार्क्सवाद की अध्ययन की पद्धति के रूप में, चिन्तन की पद्धति के रूप में, समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन लानेवाले मार्गदर्शक सिद्धान्त के रूप में, जीवन और समाज को मानवीय बनानेवाले सौन्दर्य-सिद्धान्त के रूप में स्वीकार करते हैं। एक मार्क्सवादी होने के नाते वे आत्मलोचन भी करते रहे। उनके व्याख्यानों और लेखन में भी इसके उदाहरण मिलते हैं। आलोचना को स्वीकार करने में नामवर जी का जवाब नहीं। यही कारण है कि हिन्दी क्षेत्र की शिक्षित जनता के बीच मार्क्सवाद और वामपंथ के बहुत लोकप्रिय नहीं होने के बावजूद नामवर जी उनके बीच प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हैं।

    निबन्ध मूलरूप से कई जगहों पर एकाधिक बार व्याख्यान के रूप में प्रस्तुत हुए थे। लोगों के आग्रह पर इन्हें आगे चलकर स्वतंत्र निबन्धों के रूप में व्यवस्थित करने की कोशिश की गई है।

    नामवर जी हिन्दी के सर्वोत्तम वक्ता थे और माने भी जाते रहे। उनके व्याख्यान में भाषा के प्रवाह के साथ विचारों की लय है। इस लय का निर्माण विचारों के तारतम्य और क्रमबद्धता से होता दिखता है। अनावश्यक तथ्यों और प्रसंगों से वे बेचते हैं और रोचकता का भी ध्यान हमेशा रखते हैं।

    पृष्ठ-123 रु225

    225.00
  • आधुनिकता और हिन्दी साहित्य - इन्द्रनाथ मदान

    आधुनिकता और हिन्दी साहित्य – इन्द्रनाथ मदान

    495.00
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    आधुनिकता और हिन्दी साहित्य – इन्द्रनाथ मदान

    आधुनिकता और हिन्दी साहित्य

    इन्द्रनाथ मदान

    आधुनिकता की दृष्टि से हिन्दी कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक की यह शायद पहली पहचान है। क्या इसकी परख हो भी सकती है या नहीं? इस सवाल को जगह-जगह उठाया गया है। आधुनिकता का बोध क्या है, इसे अनेक दृष्टियों से पहचानने की कोशिश की गई है। क्या इसे देश की कसौटी पर परखना संगत है या काल की कसौटी पर या देश-काल दोनों की कसौटी पर? क्या इसे ऐतिहासिक दृष्टि से आँकना सही है? क्या इसमें निरन्तरता को खोजा और पाया जा सकता है या अनिरन्तरता को? निरन्तरता किसकी या अनिरन्तरता किसकी? क्या आधुनिकता की प्रक्रिया के एक से अधिक दौर कविता, कहानी आदि में आए हैं? यदि आए हैं तो किस तरह, कैसे और कहाँ? इसकी शुरुआत कहाँ से होती है? आधुनिकता की प्रक्रिया और नगरीकरण की प्रक्रिया में क्या परस्पर सम्बन्ध है या आधुनिकता-बोध और नगर-बोध में क्या आपसी सम्बन्ध है? आधुनिकता और आधुनिकतावाद में क्या अन्तर है? क्या रचना-विशेष के अन्त:बोध के आधार पर आधुनिकता की पहचान हो सकती है? पाश्चात्य साहित्य में आधुनिकता की परख कहाँ तक संगत है? इस तरह के पेचीदा सवालों के जवाब कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक में पाना बेहतर होगा। आलोचक को यह भी लगा है कि मात्र आधुनिकता के बोध से कृति न तो कभी बनी है और न ही बन सकती है। इसलिए जिन रचनाओं को आधुनिकता की पहचान के लिए आधार बनाया गया है, उनका कृति होना लाज़मी नहीं है।

    पृष्ठ-220 रु495

    495.00
  • आद्यबिम्ब और साहित्यालोचन - कृष्णमुरारि मिश्र

    आद्यबिम्ब और साहित्यालोचन – कृष्णमुरारि मिश्र

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    आद्यबिम्ब और साहित्यालोचन – कृष्णमुरारि मिश्र

    आद्यबिम्ब और साहित्यालोचन

    कृष्णमुरारि मिश्र

    प्रोफ़ेसर कृष्णमुरारि मिश्र आधुनिक हिन्दी आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। हिन्दी में आद्यबिम्बात्मक आलोचना के प्रवर्तन का श्रेय उन्हें प्राप्त है। साहित्यिक कृतियों की संरचनात्मक गहनताओं की व्याख्या और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के लिए उन्हें विशेष ख्याति मिली है। ‘आद्यबिम्ब और साहित्यालोचन’ शीर्षक उनका प्रस्तुत ग्रन्थ इस आलोचना के सिद्धान्त और सम्‍प्रयोग से सम्बद्ध है। ग्रन्थ में तीन शीर्षक ग्रंथित हैं—’आद्यबिम्ब’, ‘आद्यबिम्ब और साहित्यालोचन : आधार’ तथा ‘ आद्यबिम्ब और साहित्यालोचन : स्वरूप’।

    ‘आद्यबिम्ब’ शीर्षक के अन्तर्गत आद्यबिम्ब की युगीय धारणा का सैद्धान्तिक विवेचन है। इसमें फ़्रायड और युग की धारणाओं के मूलभूत अन्तर का हिन्दी में पहली बार उद्‌घाटन है। साथ ही आद्यबिम्ब की युगीय धारणा का सारभूत आख्यान है जिसमें यौगपत्य के अल्पज्ञात वैज्ञानिक सिद्धान्त की भी चर्चा है। ‘आद्यबिम्ब और साहित्यालोचन : आधार’ शीर्षक से मुख्यतया युग के कला-चिन्तन का विवेचन है। आद्यबिम्बात्मक आलोचना की सैद्धान्तिकी के इस विवेचन से सिद्ध है कि युग का कला-चिन्तन हमारे भारतीय साहित्य-चिन्तन के लिए विजातीय नहीं है। वह भारतीय साहित्यशास्त्र के कालसिद्ध निकषों का पोषक है। युग की कलाविषयक धारणाएँ रससिद्धान्त और ध्वनिसिद्धान्त के बहुत निकट हैं। भारतीय काव्यशास्त्र में काव्य-हेतु के रूप में प्रतिभा के जिस स्वरूप की स्थापना की गई है, वह सामूहिक अचेतन की युगीय धारणा के निकट है। सर्जक के व्यक्तित्व की असाधारणता को भारतीय आचार्यों के समान युग ने भी मुक्त कंठ से स्वीकार किया है। भारतीय आचार्यों के समान युग ने भी काव्य की लोकमंगलकारिणी शक्ति पर बल दिया है। उन्होंने सर्जक, भावक और समाज के सन्दर्भ में काव्य के माध्यम से जिस आत्मोपलब्धि का उल्लेख किया है, उसमें आनन्द और लोकमंगल दोनों का समावेश है। ‘आद्यबिम्ब और साहित्यालोचन : स्वरूप’ शीर्षक के अन्तर्गत हिन्दी की आद्यबिम्बात्मक आलोचना के स्वरूप की सम्यक् विवृत्ति है।

    आशा है, यह ग्रन्थ भी उनके पूर्व प्रकाशित ग्रन्थों की तरह हिन्दी में समादृत होगा।

    पृष्ठ-219 रु300

    300.00
  • हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास - बच्चन सिंह

    हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास – बच्चन सिंह

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    हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास – बच्चन सिंह

    हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास

    बच्चन सिंह

    ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ हिन्दी के मूर्द्धन्य आलोचक, चिन्तक डॉ. बच्चन सिंह की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।

    उन्होंने भूमिका में लिखा है : ‘‘न तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ को लेकर दूसरा नया इतिहास लिखा जा सकता है और न उसे छोड़कर। नए इतिहास के लिए शुक्ल जी का इतिहास एक चुनौती है…।’’ किन्तु उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारते हुए आगे लिखा : ‘‘रचनात्मक साहित्य पुराने पैटर्न को तोड़कर नया बनता है, तो साहित्य के इतिहास पर वह क्यों न लागू हो?’’ ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ साहित्येतिहास के लेखन के परिप्रेक्ष्य में यही नया पैटर्न ईजाद करने का साहसिक प्रयास है।

    लेखक ने पुस्तक के पहले संस्करण की भूमिका में इस नए पैटर्न की ऐतिहासिक अनिवार्यता को स्पष्ट करते हुए लिखा : ‘‘शुक्ल जी के इतिहास का संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण सन् 1940 में छपा था। उसके प्रकाशन के बाद 50 वर्ष से अधिक का समय निकल गया। इस अवधि में अनेकानेक शोध-ग्रन्थ छपे, नई पांडुलिपियाँ उपलब्ध हुईं, ढेर-सा साहित्य लिखा गया। नया इतिहास लिखने के लिए यह सामग्री कम पर्याप्त और कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। यह भी ध्यातव्य है कि शुक्ल जी का इतिहास औपनिवेशिक भारत में लिखा गया। अब देश स्वतंत्र है। उसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र की अपनी समस्याएँ हैं। सांस्कृतिक-सामाजिक संघर्ष हैं, इन्हें देखने-समझने का बदला हुआ नज़रिया है। इस नए सन्दर्भ में यदि पिष्टपेषण नहीं करना है, तो नया इतिहास ही लिखा जाएगा।’’

    यह ‘दूसरा इतिहास’ इसी अर्थ में कुछ दूसरे ढंग से लिखा हुआ इतिहास है। शुक्ल जी के बाद के इतिहासों में अद्यतन। लेखक ने आदिकाल को अपभ्रंश काल कहा है और काव्य के साथ गद्य पर भी बेबाकी से विचार किया है। हिन्दी के भक्तिकाल का विवेचन अखिल भारतीय भक्ति-आन्दोलन के सन्दर्भ में किया गया है। भक्ति के उदय के कारणों पर भी नई दृष्टि से विचार किया गया है।

    इतिहास का सबसे मौलिक अंश रीतिकाल का विवेचन है जिसमें हिन्दी के रीतिकाव्य के साथ ही उर्दू के रीतिकाव्य का भी समावेश कर लिया गया है। इसके अलावा रीतिकाव्य के विभाजन-विवेचन में भी इतिहासकार के नए सोच के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं।

    आधुनिक काल का आरम्भ 1857 के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम से मानते हुए लेखक ने इस काल का उपविभाजन ‘नवजागरण-युग’, ‘स्वच्छन्दतावाद-युग’ तथा ‘उत्तर-स्वच्छन्दतावाद-युग’ के नाम से किया है।

    उत्तर-स्वच्छन्दतावाद-युग के अन्तर्गत प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता अैर उत्तर-आधुनिकतावाद का विवेचन मिलता है। गद्य-साहित्य का विवेचन करते समय लेखक ने हिन्दी साहित्य के आदिकाल से ही गद्य की विकास-परम्परा को रेखांकित किया है।

    यह ग्रन्थ इतिहास की धारावाहिक निरन्तरता के साथ ही हिन्दी के प्रमुख साहित्यकारों और साहित्यिक कृतियों का मौलिक दृष्टि से मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही डॉ. बच्चन सिंह ने अपने निजी दृष्टिकोण तथा साहित्यिक समझ के आधार पर इसमें बहुत कुछ नया जोड़ा है जो इस कृति को सच्चे अर्थों में हिन्दी साहित्य का विशिष्ट इतिहास प्रमाणित करता है।

    पृष्ठ-536 रु995

    995.00
  • सिद्ध साहित्य - धर्मवीर भारती

    सिद्ध साहित्य – धर्मवीर भारती

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    सिद्ध साहित्य – धर्मवीर भारती

    सिद्ध साहित्य

    धर्मवीर भारती

    बौद्ध-सिद्धों और पत्रों की सामाजिक स्थिति में भी एक बहुत बडा अन्‍तर आ चुका था। 8वीं शताब्दी में तांत्रिक आन्दोलनों के अध्ययन से प्रतीत होता था कि सारे देश में संकीर्ण जाति-व्यवस्था और शुद्धतावादी अमीर-पद्धति के विरुद्ध एक व्यापक विद्रोह जाग उठा था और निम्न वर्ग की जातियाँ उस समय सशक्त और जागरूक थीं।

    अत: एक ओर ये सन्त एक पराजित और सामाजिक अन्य से पीड़‍ित वर्ग के प्रतीक थे, दूसरी ओर ये तांत्रिक विद्रोह के खोखलेपन से भी परिचित थे और तीसरी ओर यवनों की मज़हबी कट्टरता का भी स्वागत नहीं कर पाते थे और चौथी ओर वैष्णव भज-साधना के प्रति आकर्षित होते हुए भी उनके अवतारवाद को ये तर्कसम्मत नहीं मानते थे। सिद्ध-साहित्य का यह अध्ययन एक ओर उन कई जटिलताओं का समाधान करता है जो अभी तक पत्रों और नाथयोगियों के अध्ययन में बाधक सिद्ध होती रही है, दूसरी ओर वह अनादिकाल और मध्यकाल के सर्वथा नए मूल्यांकन के लिए एक भूमिका भी प्रस्तुत करता है।

    पृष्ठ-416 रु700

    700.00
  • भारतीय भक्ति साहित्य में अभिव्यक्त सामाजिक समरसता - डॉ. सुनील बाबुराव कुलकर्णी

    भारतीय भक्ति साहित्य में अभिव्यक्त सामाजिक समरसता – डॉ. सुनील बाबुराव कुलकर्णी

    750.00
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    भारतीय भक्ति साहित्य में अभिव्यक्त सामाजिक समरसता – डॉ. सुनील बाबुराव कुलकर्णी

    भारतीय भक्ति साहित्य में अभिव्यक्त सामाजिक समरसता

    डॉ. सुनील बाबुराव कुलकर्णी

    धार्मिक और दार्शनिक दृष्टि से भक्ति साहित्य का विवेचन एवं विश्लेषण जितनी पर्याप्त मात्रा में मिलता है, उतनी पर्याप्त मात्रा में सामाजिक दृष्टि को ध्यान में रखकर किया गया विश्लेषण नहीं मिलता। उसमें भी ‘समरसता’ जैसी अधुनातन अवधारणा को केन्‍द्र में रखकर भक्ति साहित्य का विवेचन तो आज तक किसी ने नहीं किया। दूसरी बात कि समरसता की अवधारणा को लेकर लोगों में असमंजस का भाव है। उसे दूर करना भी एक युग की आवश्यकता थी। पुस्तक में इन्ही बातों को विद्वानों ने अपने शोध-आलेखों में सप्रमाण सिद्ध किया है।

    पुस्तक का विषय निर्धारण करते समय इस बात पर भी विचार किया गया है कि साहित्य में भक्ति की सअजस्र धरा प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक प्रवाहित रही है, उसे मध्यकाल तक सीमित मानना तर्कसंगत नहीं। मध्यकाल के पहले और मध्यकाल के बाद भी साहित्य में हम भक्ति के बीजतत्‍त्‍वों को आसानी से फलते-फूलते देख सकते हैं। इस कारण ‘आदिकालीन भक्ति साहित्य में अभिव्यक्त सामाजिक समरसता’ और ‘आधुनिककालीन सन्‍तों और समाजसुधारकों के सहित्य में अभिव्यक्त सामाजिक समरसता’ जैसे विषय विद्वानों के चिन्‍तन व विमर्श के मुख्य केन्‍द्र में हैं।

    आदिकाल से लेकर आधुनिककाल के भारतीय भक्ति साहित्य के पुनर्मूल्यांकन की दृष्टि से यह पुस्तक निस्सन्‍देह एक उपलब्धि की तरह है।

    पृष्ठ-344 रु750

    750.00
  • नया साहित्य : नया साहित्यशास्त्र - राधावल्लभ त्रिपाठी

    नया साहित्य : नया साहित्यशास्त्र – राधावल्लभ त्रिपाठी

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    नया साहित्य : नया साहित्यशास्त्र – राधावल्लभ त्रिपाठी

    नया साहित्य : नया साहित्यशास्त्र

    राधावल्लभ त्रिपाठी

    ‘नया साहित्य : नया साहित्यशास्त्र’ प्रख्यात साहित्यकार, समीक्षक तथा संस्कृत के विद्वान राधावल्लभ त्रिपाठी की काव्यशास्त्र पर तीसरी पुस्तक है। यह संस्कृत काव्यशास्त्र के अलंकार प्रस्थान की व्यापक वैचारिक और संरचनात्मक आधारभूमि को रेखांकित करती है। अलंकार की व्यावहारिक परिणतियों और अलंकार विमर्श की व्यापक अर्थवत्ता को आज के साहित्य के सन्दर्भ में यहाँ परखा गया है। अलंकार तत्त्व की इसमें प्रस्तुत नई व्याख्या उसकी अछूती सम्भावनाएँ खोलती है तथा साहित्य के अध्ययन के लिए संरचनावादी काव्यशास्त्र की एक भूमिका निर्मित करती है। संस्कृत के प्रख्यात कवियों के साथ हिन्दी कवियों में निराला और मुक्तिबोध तथा बोरिस पास्तरनाक जैसे रूसी रचनाकारों और मिलान कुन्देरा जैसे उत्तर-आधुनिक युग के लेखकों तक की मीमांसा लेखक ने निर्भीकता के साथ यहाँ की है।

    लेखक का मानना है कि पश्चिम में सस्यूर, सूसन लैंगर, चॉम्स्की आदि के प्रतिपादन तथा उत्तर-आधुनिकतावाद के सन्दर्भ में भारतीय काव्य-चिन्तन के अलंकार तत्त्व की महती पीठिका पुनः उजागर करना ज़रूरी है।

    पृष्ठ-143 रु395

    395.00
  • परस्पर : भाषा-साहित्य-आन्दोलन - राजीव रंजन गिरि

    परस्पर : भाषा-साहित्य-आन्दोलन – राजीव रंजन गिरि

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    परस्पर : भाषा-साहित्य-आन्दोलन – राजीव रंजन गिरि

    परस्पर : भाषा-साहित्य-आन्दोलन

    राजीव रंजन गिरि

    “हिन्दी भाषा का विमर्श और संघर्ष लम्बा है, लेकिन अभाग्यवश हमारा निपट वर्तमान पर आग्रह इतना इकहरा हो गया है कि उसकी परम्परा को भूल जाते हैं। एक युवा चिन्तनशील आलोचक ने विस्तार से इस विमर्श और संघर्ष के कई पहलू उजागर करने की कोशिश की है और कई विवादों का विवरण भी सटीक ढंग से दिया है। हम इस प्रयत्न को बहुत प्रासंगिक मानते हैं और इसलिए इस पुस्तक माला में सहर्ष प्रस्तुत करते हैं।”

    —अशोक वाजपेयी

    पृष्ठ-208 रु595

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  • साहित्यालोचन - श्यामसुंदर दास

    साहित्यालोचन – श्यामसुंदर दास

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    साहित्यालोचन – श्यामसुंदर दास

    साहित्यालोचन

    श्यामसुंदर दास

    ‘साहित्यालोचन’ का प्रकाशन 1922 में हुआ था। हिन्दी भाषा के अध्ययन-अध्यापन और विकास के लिए बाबू श्यामसुन्दर दास ने जो प्रयास किए थे, उनमें इस पुस्तक का विशिष्ट स्थान है।

    यह पुस्तक साहित्य और अन्यान्य कलाओं की मूल अवधारणाओं का निरूपण करते हुए, कला के भिन्न-भिन्न रूपों, और विशेष रूप से साहित्य की विभिन्न श्रेणियों के आस्वादन और तदनुरूप उनके विवेचन की आधारशिला रखनेवाली कृति है। ग़ौरतलब है कि बीसवीं सदी के आरम्भिक दशकों में जब हिन्दी की रचनात्मकता अपने शास्त्र की खोज ही कर रही थी, इस पुस्तक की मूल प्रस्थापनाओं में इस बात को रेखांकित करना उन्हें आवश्यक लगा था कि आलोचना-समीक्षा अथवा शास्त्र का काम साहित्य-रचना के लिए नियमों का निर्धारण नहीं है, बल्कि उसके साथ चलते हुए अपनी भी दृष्टि का विस्तार करना है। लेकिन आज भी आलोचना अक्सर इस भ्रम में भटक जाती है कि वह रचना को रास्ता दिखानेवाली कोई मशाल है।

    इस पुस्तक को पढ़ते हुए हम जान पाते हैं कि हमारी भाषा का वह युग सत्य और तर्क को लेकर कितना सजग था और आज भी हमें उस दृष्टि की कितनी आवश्यकता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि गत लगभग एक सदी से यह पुस्तक अपनी उपयोगिता को बरकरार रखे हुए है, और आज भी न सिर्फ़ छात्रों के लिए बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए उपादेय है जो हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति गम्भीर है।

    पृष्ठ-256 रु595

    595.00
  • बीसवीं शताब्दी का हिन्दी साहित्य - विजयमोहन सिंह

    बीसवीं शताब्दी का हिन्दी साहित्य – विजयमोहन सिंह

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    बीसवीं शताब्दी का हिन्दी साहित्य – विजयमोहन सिंह

    बीसवीं शताब्दी का हिन्दी साहित्य

    विजयमोहन सिंह

    ‘बीसवीं शताब्दी का हिन्दी साहित्य’ विजयमोहन सिंह की नवीनतम समीक्षा-कृति है। लगभग ढाई सौ पृष्ठों के अपने सीमित आकार में, एक पूरी सदी के साहित्य की पड़ताल करने वाली यह एक ऐसी किताब है, जिसे एक सर्जक-आलोचक के सुदीर्घ अध्ययन तथा मनन का परिपाक कहा जा सकता है। पिछले कुछ समय से पश्चिम में और अपने यहाँ भी, साहित्येतिहास के लेखन की परम्परा कुछ ठहर-सी गई है—बल्कि कुछ हलकों में तो ऐसे लेखन की क्रमबद्ध पद्धति को सन्देह की दृष्टि से भी देखा गया है। ऐसी स्थिति में इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक है कि इक्कीसवीं सदी के जिस बिन्दु पर हम खड़े हैं वहाँ साहित्य के विकास की प्रक्रिया को किस तरह देखा-परखा जाए या फिर उसकी पद्धति क्या हो? इस पुस्तक को पढ़ते हुए मेरे मन पर पहला प्रभाव यही पड़ा कि यह उसी प्रश्न के उत्तर की दिशा में की गई एक कोशिश है—शायद पहली मगर गम्भीर कोशिश।

    अपनी भूमिका में लेखक ने ज़ोर देकर कहा है कि ‘इस पुस्तक को किसी भी अर्थ में इतिहास न माना जाए’—  क्योंकि न तो यहाँ तिथियों का अंकगणित मिलेगा, न किसी तरह के फुटनोट, न ही पूर्वापर सम्बन्धों की क्रमिकता। यदि मिलेगी तो कुछ अलक्षित अन्तःसूत्रों की निशानदेही और कई बार कुछ स्थापित मान्यताओं के बरक्स कोई सर्वथा नया विचार और हाँ, वह नैतिक साहस भी जो किसी नए विचार की प्रस्तावना के लिए ज़रूरी होता है।

    अनुभव पकी दृष्टि, गहरी सूझ-बूझ और विश्लेषणपरक पद्धति के साथ किया गया, पिछली सदी के साहित्य का यह पुनरवलोकन, साहित्य के अध्येताओं का ध्यान तो आकृष्ट करेगा ही—शायद कुछ प्रश्नों पर नए सिरे से सोचने के लिए उत्प्रेरित भी करे।

    —केदारनाथ सिंह

    पृष्ठ-260 रु95

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  • साहित्य का समाजशास्त्र - बच्चन सिंह

    साहित्य का समाजशास्त्र – बच्चन सिंह

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    साहित्य का समाजशास्त्र – बच्चन सिंह

    साहित्य का समाजशास्त्र

    बच्चन सिंह

    राजनीतिक जगत की तरह आलोचना भी दो शिविरों में बँट गई है—समाजशास्‍त्र का शिविर और भाषाशास्‍त्र का शिविर। दोनों शिविर समय-समय पर एक दूसरे पर हमला करते हैं। आलोचना का संकट यह है कि क्या उसे हर हालत में शिविरबद्ध होकर ही रहना पड़ेगा? सही बात तो यह है कि हम न जीवन में विज्ञान और टेक्नोलॉजी से मुक्त हो सकते हैं और न साहित्य से। यदि साहित्य को अपनी रक्षा करनी है तो उसे विज्ञान और टेक्नोलॉजी से सहायता लेनी पड़ेगी। अत: साहित्य के रूपवादी दृष्टिकोण की एकतरफ़ा भर्त्सना नहीं की जा सकती। उसमें ऐसे तत्त्व मौजूद हैं जिनसे समाजशास्रीय आलोचना सम्पुष्ट और मुकम्मल होगी।

    पृष्ठ-100 रु125

    125.00
  • हिन्दी रीति साहित्य - भगीरथ मिश्र

    हिन्दी रीति साहित्य – भगीरथ मिश्र

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    हिन्दी रीति साहित्य – भगीरथ मिश्र

    हिन्दी रीति साहित्य

    भगीरथ मिश्र

    मध्यकालीन साहित्य के विश्रुत विद्वान डॉ. भगीरथ मिश्र ने इस छोटी-सी पुस्तक में हिन्दी-काव्य की एक अत्यन्त वेगवती धारा का सर्वांगीण अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस काव्यधारा की पृष्ठभूमि के रूप में उन्होंने लोक-भाषा की परम्परा, रीति-साहित्य के विकास के कारणों और तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों पर विस्तार से विचार किया है। सामान्यतः इस काव्यधारा पर जो दोष लगाए जाते हैं, उन पर क्रमबद्ध रूप से विचार करते हुए निष्कर्ष रूप में कहा है कि ‘उस समय रीति साहित्य का बँधी-बँधाई परिपाटी पर विकास, रूढ़िवादिता नहीं वरन् अतिशय राजप्रशंसा से मुक्ति पाने और शुद्ध काव्य लिखने के उद्देश्य को पूरा करनेवाला है।’ और ‘हिन्दी-रीति साहित्य का जिन परिस्थितियों में विकास हुआ उनका पूरा प्रभाव आत्मसात् करके भी इस साहित्य की अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक देन है।’

    लेखक का मानना है कि हमें ‘रीति-साहित्य’ को संकीर्णता से नहीं बल्कि साहित्यिक उदारता से देखना चाहिए जिससे केवल आम और अमरूद की उपयोगिता से प्रभावित लोगों के लिए बिहारी को फिर यह न कहना पड़े कि :

    ‘फूल्यो अनफूल्यो रह्यो गँवई गाँव गुलाब।’

    पृष्ठभूमि के उपरान्त डॉ. मिश्र ने ‘रीति’ के तात्पर्य, रीतिशास्त्र की परम्परा और उसके आधार को स्पष्ट करते हुए अलंकार सम्प्रदाय, रस सम्प्रदाय और ध्वनि सम्प्रदाय के इतिहास और सिद्धान्त पर भी विस्तार से विचार किया है। साथ ही, इन सम्प्रदायों के विभिन्न आचार्यों और उनके योगदान का समुचित मूल्यांकन किया है।

    पुस्तक के अन्त में रीति-काव्य धारा के नौ प्रमुख कवियों का काव्य-चयन है। उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचन के सन्दर्भ में इस काव्य को पढ़ना पाठकों के लिए रुचिकर अनुभव होगा। इस प्रकार सिद्धान्त और व्यवहार की समवेत प्रस्तुति के रूप में यह पुस्तक हिन्दी रीति-साहित्य का सांगोपांग इतिहास ही है, जो साहित्य के विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, सन्दर्भ-ग्रन्थों के विस्तृत उल्लेख से विद्वानों के लिए भी समान रूप से उपयोगी हो गई है।

    पृष्ठ-211 रु175

    175.00
  • हिन्दी साहित्य का परिचयात्मक इतिहास - भगीरथ मिश्र

    हिन्दी साहित्य का परिचयात्मक इतिहास – भगीरथ मिश्र

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    हिन्दी साहित्य का परिचयात्मक इतिहास – भगीरथ मिश्र

    हिन्दी साहित्य का परिचयात्मक इतिहास

    भगीरथ मिश्र

    साहित्य के इतिहासकार को किसी भी युग के साहित्य को रँगे चश्मे से नहीं देखना चाहिए, क्योंकि जो भी साहित्य युगान्तर तक जीवित रहता है, उसमें निश्चय ही कुछ जीवन्त तत्त्व रहते हैं, उनका विश्लेषण करना अभीष्ट होना चाहिए।

    इन्हीं सब बातों का अनुभव करते हुए यह ‘हिन्दी साहित्य का परिचयात्मक इतिहास’ प्रस्तुत किया गया है।

    प्रत्येक कालखंड में प्रचलित साहित्यिक धाराओं और युगों का अलग-अलग स्पष्ट परिचय दिया गया है तथा साहित्यकार और उसकी रचनाओं के तथ्यात्मक विवरण यथाशक्ति पूरे रूप से देने का प्रयत्न किया गया है।

    आधुनिक काल के अन्तर्गत काव्य और गद्य साहित्य की विविध विधाओं का अलग-अलग युगानुसार परिचय दिया गया है। गद्य साहित्य के साथ अन्त में हिन्दी पत्रकारिता के विकास का भी संक्षिप्त विवरण दे दिया गया है, क्योंकि हिन्दी गद्य की विविध विधाओं के विकास और प्रचार में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान है।

    काव्य के प्रसंग में और विशेष रूप से प्राचीन और मध्ययुगीन काव्य-युगों और प्रवृत्तियों के विवरण के अन्त में प्रत्येक प्रवृत्ति की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त उल्लेख कर दिया गया है, जिससे आगे के युग पर दृष्टिपात करने के पहले उस युग, धारा अथवा काव्य-प्रवृत्ति का एक समग्र स्वरूप मन में उतर सके और आगामी युग, धारा अथवा प्रवृत्ति के काव्य को समझने में सुविधा हो सके। इसी प्रकार प्रत्येक कालखंड और तत्सम्बन्धी युग के साहित्य का परिचय देने के पूर्व संक्षेप में उस काल अथवा युग की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि देने का उपक्रम है, जिसके आधार पर यह समझा जा सके कि साहित्य में नए मोड़ क्यों आए और नई चेतना का प्रवर्तन किस कारण से हुआ। इन प्रश्नों को समझ लेने पर उस युग के साहित्य की विशेषताओं को हृदयंगम करने में सुविधा प्राप्त हो जाती है।

    काव्य के इतिहास के प्रसंग में और विशेष रूप से प्राचीन और मध्यकालीन काव्यधाराओं के परिचय में कवि-परिचय के साथ-साथ उसकी विशिष्टताओं को स्पष्ट करने के लिए काव्य की कुछ पंक्तियाँ भी उदाहरणस्वरूप दी गई हैं। इससे जहाँ एक ओर तथ्यात्मक विवरण की नीरसता दूर हो जाती है, वहीं दूसरी ओर काव्य-युगों को समझने में भी सुविधा होती है।

    इस संक्षिप्त, किन्तु पूरे हिन्दी साहित्य के विवरण का अवलोकन करने से यह बात भली-भाँति समझ में आ जाती है कि हिन्दी भाषा और उसके साहित्य में कितनी विविधता और व्यापकता है। लगभग एक हज़ार वर्ष का लम्बा उसका साहित्यिक इतिहास है और भाषा तो और भी पहले से है—लगभग पन्द्रह सौ वर्ष पहले से अवधी और ब्रज भाषा के शब्द सिद्ध साहित्य और संस्कृत ग्रन्थों में मिलने लगते हैं। इस लम्बी यात्रा में हिन्दी भाषा के पूर्वी और पश्चिमी रूपों में कितनी विविधता और कितना विस्तार आया तथा उसके साहित्य का कितना विविध और व्यापक विकास हुआ—इस बात का एक सहज अनुमान इस इतिहास के अध्ययन से लगाया जा सकता है। इसमें विवेचन कम और परिचय अधिक है, जिससे यह हिन्दी साहित्य के इतिहास के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सके।

    प्रस्तुत कृति लगभग तीस वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी। अतः पुस्तक के अन्तिम खंड (आधुनिक काल) को अधुनातन स्वरूप प्रदान किया जाना आवश्यक था। इसी दृष्टि से आधुनिक काल में साहित्य की विविध विधाओं में हुए विकास का संक्षिप्त इतिवृत्त इस कृति में समाविष्ट किया गया है। आशा है, सुविज्ञ पाठक इससे लाभान्वित होंगे।

    पृष्ठ-180 रु300

    300.00
  • साहित्य के सिद्धान्त तथा रूप - भगवतीचरण वर्मा

    साहित्य के सिद्धान्त तथा रूप – भगवतीचरण वर्मा

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    साहित्य के सिद्धान्त तथा रूप – भगवतीचरण वर्मा

    साहित्य के सिद्धान्त तथा रूप

    भगवतीचरण वर्मा

    भगतीवचरण वर्मा ने साहित्य की विभिन्न विधाओं को अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियाँ दी हैं। इन कृतियों के पीछे कौन-सी प्रेरक शक्तियाँ रही हैं और कौन-से सिद्धान्त वर्मा जी के लेखकीय जीवन की आधारभूमि हैं, यह जानना भगवती बाबू के असंख्य पाठकों की जिज्ञासा का विषय रहा है। इन तमाम जिज्ञासाओं के समाधान की खोज का परिणाम है : भगवतीचरण का महत्त्वपूर्ण सैद्धान्तिक ग्रन्थ—‘साहित्य के सिद्धान्त तथा रूप’।

    इस ग्रन्थ में लेखक की प्रतिज्ञा एकदम भिन्न और नए रूप में प्रकट हुई है। यहाँ साहित्य के सिद्धान्तों का विश्लेषण शुष्क शास्त्रीय ढंग से नहीं, लेखक के आधी शताब्दी के अनुभवों के आधार पर हुआ है। ग्रन्थ में रचना-प्रक्रिया का व्यावहारिक विश्लेषण है और साथ ही लेखक के रचना-संसार की कठिनाइयों से साक्षात्कार भी। यह कृति पाठकों तथा शोधकर्ताओं के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी।

    पृष्ठ-193 रु200

    200.00
  • साहित्य का उत्तर समाजशास्त्र - सुधीश पचौरी

    साहित्य का उत्तर समाजशास्त्र – सुधीश पचौरी

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    साहित्य का उत्तर समाजशास्त्र – सुधीश पचौरी

    साहित्य का उत्तर समाजशास्त्र

    सुधीश पचौरी

    गोष्ठियों के रूप अभी भी शादी-ब्याह की तरह हैं। एक दूल्हा, बाक़ी बाराती। गोष्ठी के मंच जातिभेद कराते हैं। ऊपर महान बैठेंगे। नीचे दासानुदास। एकदम विनय पत्रिका वाली हाइरार्की। प्रगतिशील, रूपवादी सब ये ही करते हैं।

    बहस न सही, तू-तू, मैं-मैं ही सही। कुछ तो है। बुरा क्या है? नए पूँजीवाद में ये तो होना ही है।

    मशाल टार्च बन चुकी है। राजनेता के पास जो ब्रांड टार्च है, वही साहित्यकार के पास है। ‘साहित्य और राजनीति’ की चिर बहस अब मर चुकी है। यही अच्छा है।

    पढ़ें तो जानें, क्योंकि ये ‘अन्दर की बात है’। साहित्य का असल समाजशास्त्र है। यह ‘अन्दर की बात’ बहुत जटिल है रे!

    और हम सब जो ‘बचे-खुचे’ हैं, तरह-तरह की ‘पूरणीय क्षतियाँ’ हैं जो हर गोष्ठी, सेमिनार, शोकसभा में मौजूद रहती हैं। होंगी कोई हज़ार-पाँच सौ। हम सब अपूरणीय ‘क्षति’ करके ही जाएँगे। बच्चो सावधान!

    पृष्ठ-195 रु250

    250.00