प्रबन्धन

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  • आरंभिक भारतीय

    आरंभिक भारतीय

    350.00
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    आरंभिक भारतीय

    टोनी जोसेफ़

    हम भारतीय कौन हैं?
    हम कहाँ से आए थे?

    इन गहन सवालों के जवाबों को जानने के लिए पत्रकार टोनी जोसेफ़ 65,000 वर्ष अतीत में जाते हैं, जब आधुनिक मानवों या होमो सेपियन्स के एक समूह ने सबसे पहले अफ़्रीका से भारतीय उपमहाद्धीप तक का सफ़र तय किया था। हाल के डीएनए प्रमाणों का हवाला देते हुए वे भारत में आधुनिक मानवों के बड़े पैमाने पर हुए आगमन यानी ईरान से 7000 ईसा पूर्व और 3000 ईसा पूर्व के बीच कृषकों के आगमन तथा 2000 ईसा पूर्व और 1000 ईसा पूर्व के बीच मध्य एशियाई स्टेपी (घास के मैदान) से अन्य लोगों के साथ ही पशुपालकों के आगमन का भी पता लगाते हैं।
    आनुवांशिक विज्ञान और अन्य अनुसंधानों के परिणामों का उपयोग करते हुए जोसेफ़ जब हमारे इतिहास की परतों का ख़ुलासा करते हैं, तब उनका सामना भारत के इतिहास के कुछ सबसे विवादास्पद और असहज सवालों से होता है :

    • हड़प्पा के लोग कौन थे?
    • क्या आर्यों का भारत में वास्तव में आगमन हुआ था?
    • क्या उत्तर भारतीय आनुवांशिक रूप से दक्षिण भारतीयों से भिन्न हैं?

    यह एक बेहद महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, जो प्रामाणिक और साहसी तरीक़े से आधुनिक भारत की वंशावली से जुड़ी चर्चाओं पर विराम लगाती है। यह पुस्तक न केवल हमें यह दिखाती है कि आधुनिक भारत की जनसंख्या के वर्तमान स्वरूप की रचना कैसे हुई, बल्कि इस बारे में भी निर्विवाद और महत्वपूर्ण सत्य का ख़ुलासा करती है कि हम कौन हैं।

    हम सब बाहर से आकर बसे हैं
    और हम सब मिश्रित जाति के हैं

    टोनी जोसेफ़
    बिज़नेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक टोनी जोसेफ़ अनेक शीर्ष अख़बारों और पत्रिकाओं में कॉलम लिखते रहे हैं। उन्होंने हिंदुस्तान के प्रागितिहास पर भी अनेक प्रभावशाली लेख लिखे हैं।


    AWARDS Received for this book:

    • Best non-fiction books of the decade (2010-2019) – The Hindu.
    • Book of the Year Award (non-fiction), Tata Literature Live, 2019 – The Wire.
    • Shakti Bhatt First Book Prize 2019 – The Indian Express.
    • Atta Galatta Award for best Non-Fiction, 2019 – Deccan Herald.
    • One of the 10 Best New Prehistory Books To Read In 2020, as identified by Book Authority.

    पृष्ठ 226   रु350

    350.00
  • ब्रह्मांड के बड़े सवालों के संक्षिप्त जवाब

    ब्रह्मांड के बड़े सवालों के संक्षिप्त जवाब

    350.00
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    ब्रह्मांड के बड़े सवालों के संक्षिप्त जवाब

    स्टीफ़न हॉकिंग 

    दुनिया के प्रसिद्ध ब्रह्मांड विज्ञानी और अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम के लेखक के ब्रह्मांड के सबसे बड़े प्रश्नों पर व्यक्त अंतिम विचार उनकी इस मरणोपरांत प्रकाशित पुस्तक में दिए गए हैं।

    ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई? क्या मानवता पृथ्वी पर अस्तित्व में रहेगी? क्या सौर मंडल से भी ज्यादा बौद्धिक जीवन कोई है? क्या आर्टिफ़िशल इंटेलिजेंस हमें नियंत्रित करेगा?

    अपने असाधारण करिअर में स्टीफन हॉकिंग ने ब्रह्मांड के प्रति हमारी समझ को और अधिक विस्तार दिया है तथा कई रहस्यों को उजागर किया है। लेकिन फिर भी ब्लैक होल्स, काल्पनिक समय और विभिन्न इतिहास-काल पर उनका सैद्धान्तिक कार्य उनकी सोच को अंतरिक्ष के गूढ़तम स्तर तक ले जाता है। हॉकिंग मानते थे कि पृथ्वी पर जो भी समस्याएं हैं, उनको हल करने में विज्ञान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    अब हम इन विनाशकारी बदलावों का सामना कर रहे हैं – जैसे पर्यावरण में बदलाव, परमाणु युद्ध की चुनौती और आर्टिफ़िशल सुपर इंटेलिजेंस का विकास। स्टीफ़न हॉकिंग सबसे अहम और मानवता के लिए अति महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी बात कह रहे हैं।

    मानव के रूप में हम जो चुनौती अपने समक्ष पाते हैं और ये पृथ्वी किस दिशा में बढ़ रही है, उस बारे में लेखक के निजी विचार इस पुस्तक में दिए गए हैं।

    स्टीफ़न हॉकिंग एक उत्कृष्ट सैद्धांतिक भौतिकविद और दुनिया के सबसे महान विचारकों में से एक माने जाते थे। वे तीस वर्षों तक केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफ़ेसर रहे और साथ ही वे दुनिया की बेस्टसेलर पुस्तक ‘अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम’ के लेखक भी हैं।
    सामान्य पाठकों के लिए उनकी अन्य पुस्तकों में शामिल हैं ‘अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम’, निबंध संकलन ‘ब्लैक होल्स एंड बेबी यूनिवर्सिस’, ‘द युनिवर्स इन अ नटशेल’, ‘द ग्रैंड डिज़ाइन’ और ‘ब्लैक होल्स : द बीबीसी राइथ लैक्चर्स’।

    उन्होंने अपनी बेटी लूसी हॉकिंग के साथ बच्चों की पुस्तकें भी लिखी हैं, जिनमें पहली पुस्तक थी ‘जॉर्जिस सीक्रेट की टु द यूनिवर्स’ । 14 मार्च 2018 को उनका देहांत हो गया।

    डिलीवरी पर नकद / ऑनलाइन पेमेंट  उपलब्ध
    पृष्ठ 212   रु350

    350.00
  • कैसा गुरु? कैसी मुक्ति?

    कैसा गुरु? कैसी मुक्ति?

    60.00
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    कैसा गुरु? कैसी मुक्ति?

    राजा राम हंडियाया

    तर्कशील सोसायटी हरियाणा के प्रधान श्री राजा राम हंडियाया की प्रथम पुस्तक ‘ परमात्मा कब कहां और कैसे ?” की सफल प्राप्ति के बाद यह दूसरी पुस्तक ” कैसा गुरू? कैसी मुक्ति ” भी अंधविश्वासों तथा धर्म, गुरू व मोक्ष की पुरातन व गैरवैज्ञानिक धारणाओं को खत्म करने व नई चेतना लाने में एक कारगर हथियार साबित होगी ।

    –  मेघ राज मित्र

    प्रधान तर्कशील सोसायटी भारत

    Tarksheel / Tarkshil 

    रु 60

    60.00
  • रिच डैड पुअर डैड

    रिच डैड पुअर डैड

    399.00
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    रिच डैड पुअर डैड

    रोबर्ट टी कियोसाकि

    रॉबर्ट कियोसाकी का ‘रिच डैड पुअर डैड’ अब तक की व्यक्तिगत  # 1 वित्तीय पुस्तक बन गया है, जिसका दर्जनों भाषाओं में अनुवाद किया गया और दुनिया भर में बेचा गया।

    ‘सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब’

    यह बेस्टसेलिंग पुस्तक सरल भाषा में सिखाती है कि पैसे की सच्चाई क्या है और अमीर कैसे बना जाता है। लेखक के अनुसार दौलतमंद बनने की असली कुंजी नौकरी करना नहीं है, बल्‍कि व्यवसाय या निवेश करना है।

    रॉबर्ट कियोसाकी अंतरराष्ट्रीय भगोड़ा बेस्टसेलर जिसने छह वर्षों से अधिक समय तक न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्टसेलर सूची में शीर्ष स्थान हासिल किया है – एक निवेशक, उद्यमी और शिक्षक हैं, जिनके पैसे और निवेश के दृष्टिकोण चेहरे पर उड़ते हैं।

    डिलीवरी पर नकद / ऑनलाइन पेमेंट  उपलब्ध
    पृष्ठ 215   रु399

    399.00
  • भारत का संविधान – हिंदी और अंग्रेजी संस्करण

    900.00
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    भारत का संविधान – हिंदी और अंग्रेजी संस्करण

    भारत का संविधान – हिंदी और अंग्रेजी में

    भारत का संविधान अब हिंदी और अंग्रेजी में । अथवा 2020 के 104वें संशोधन तक के नए संशोधनों को भी शामिल किया गया है। यह उन हिंदी पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया हैं जो हमारे संविधान को अपनी मातृभाषा (हिन्दी अथवा अंग्रेजी)में पढ़ना पसंद करते हैं।

    अद्यतन संस्करण, 2020 दिसंबर तक

    Constitution of India In English and Hindi. Updated up to 104th amendments of 2020
    (Print Edition)

    Bharat Ka Samvidhan / Bharat Ka Sanvidhan

    पृष्ठ 824   रु900

    900.00
  • आदर्श प्रबन्धन के सूक्त – सुरेश कांत

    125.00
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    आदर्श प्रबन्धन के सूक्त – सुरेश कांत

    आदर्श प्रबन्धन के सूक्त
    सुरेश कांत

    प्रबन्धन आत्म-विकास की एक सतत् प्रक्रिया है। अपने को व्यवस्थित-प्रबन्धित किए बिना आदमी दूसरों को व्यवस्थित-प्रबन्धित करने में सफल नहीं हो सकता, चाहे वे दूसरे लोग घर के सदस्य हों या दफ़्तर अथवा कारोबार के। इस प्रकार आत्म-विकास ही घर-दफ़्तर दोनों की उन्नति का मूल है। इस लिहाज़ से देखें, तो प्रबन्‍धन का ताल्लुक़ कम्पनी-जगत के लोगों से ही नहीं, मनुष्य मात्र से है। वह इंसान को बेहतर इंसान बनाने की कला है, क्योंकि बेहतर इंसार ही बेहतर कर्मचारी, अधिकारी, प्रबन्धक या करोबारी हो सकता है।

    ‘आदर्श प्रबन्धन के सूक्त’ में संकलित आलेखों को पाँच खंडों में विभाजित किया गया है—व्यक्तित्व-विकास, कैरियर निर्माण, औद्योगिक सम्बन्ध, समय-प्रबन्धन और कौशल-विकास। इस पुस्तक से आप अपनी व्यक्तिगत  क्षमताओं की लगातार जाँच-परख और आशावाद की उपयोगिता को समझ सकते हैं। साथ ही ख़ुश रहने, अपनी भीतरी शक्तियों के विकास, अपनी सामर्थ्य के भरसक उपयोग और सटीक लक्ष्य-निर्धारण की व्यावसायिक उपादेयता का आकलन कर सकते हैं। इसके अलावा संघर्षों की महत्ता, पेशा बदलने से सफलता, सलाहकार व कार्यपालक के आपसी रिश्तों, और साख आदि विषयों पर भी इसमें प्रकाश डाला गया है।

    प्रबन्धन और आत्मविकास के क्षेत्र में वर्षों से अध्ययन व लेखनरत लेखक की एक महत्वपूर्ण पुस्तक।

    पृष्ठ-198 रु125

    125.00
  • आप ही बनिए कृष्ण – डॉ. गिरीश पी. जाखोटिया

    150.00
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    आप ही बनिए कृष्ण – डॉ. गिरीश पी. जाखोटिया

    आप ही बनिए कृष्ण
    डॉ. गिरीश पी. जाखोटिया

    महाभारत के चरित्रों में अकेले कृष्ण हैं, जिनका किसी न किसी रूप में प्रायः सभी चरित्रों से जुडाव रहा। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे सिंहासन पर विराजमान सम्राट से लेकर गली-कूचों में घूमनेवाली ग्वालिनों तक सबसे उनके स्तर पर जाकर संवाद ही नहीं कर लेते थे, उन्हें अपनी नीति और राजनीति का पोषक भी बना लेते थे। बचपन से लेकर प्रौढ़ावस्था तक देश-भर में उन्होंने जो किया और जैसे किया, उनके सिवा और कौन कर सका? अपने हर काम से वे विपक्षी को पस्त-परास्त और निरस्त्र ही नहीं कर देते थे, उसे अपना अनुरक्त भी बना लिया करते थे। अपने कारनामों के औचित्य के अदभुत-अपूर्व तर्क भी वे जुटा लिया करते थे। धरती के भविष्य को सँवारने और पर्यावरण को बचाने के साथ-साथ सबको प्यार देने और सबका प्यार पाने में कृष्ण पूर्णतः सफल सिद्ध हुए। योगेश्वर कृष्ण की क्रन्तिकारी नीतियों, सफल रणनीतियों, दार्शनिक विचारों और नेतृत्व की अदभुत शैलियों को प्रबन्‍धन की दृष्टि से विवेचित-विश्लेषित करनेवाली हिन्‍दी की एक ऐसी पुस्तक, जिसे पढ़कर आप भी अपने जीवन को कृष्ण की तरह एक विजेता के रूप में ढाल सकते हैं।

    पृष्ठ-171 रु150

    150.00
  • आपसी मदद (म्यूचुअल एड) – प्रिंस पीटर एलेक्सेयेविच क्रोपोत्किन

    150.00
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    आपसी मदद (म्यूचुअल एड) – प्रिंस पीटर एलेक्सेयेविच क्रोपोत्किन

    आपसी मदद (म्यूचुअल एड)
    प्रिंस पीटर एलेक्सेयेविच क्रोपोत्किन

    पशु-जगत में हमने देखा है कि अधिकांश प्रजातियाँ सामाजिक जीवन जीती हैं तथा साहचर्य उनके लिए संघर्ष का सर्वोत्तम हथियार है तथा यह संघर्ष डारविन के भावानुरूप केवल अस्तित्व-रक्षा के लिए नहीं, बल्कि प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थितियों के विरुद्ध होता है। इस प्रकार उन्हें जो पारस्परिक सुरक्षा उपलब्ध होती है, उससे उनकी दीर्घायु तथा संचित अनुभव की सम्भावना तो बढ़ती ही है, उनका उच्चतर बौद्धिक विकास भी होता है तथा प्रजाति का और अधिक विस्तार भी होता है। इसके विपरीत अलग-थलग रहनेवाली प्रजातियों का क्षय अवश्यम्भावी होता है। जहाँ तक मनुष्य का सवाल है, पाषाण-युग से ही हम देखते हैं कि मनुष्य कुनबों और कबीलों में रहता है; कुल-गोत्रों और जनजातियों में देखा जा सकता है कि किस प्रकार उनमें सामाजिक संस्थानों की एक व्यापक शृंखला पहले से ही विकसित है; और हमने देखा कि प्रारम्भिक जनजातीय रीति-रिवाजों तथा व्यवहार ने मनुष्य को उन संस्थानों का आधार दिया जिन्होंने प्रगति की प्रमुख अवस्थिति का निर्माण किया। विश्वविख्यात लेखक प्रिंस पीटर एलेक्सेयेविच क्रोपोत्किन की इस अत्यन्त चर्चित कृति में यह दर्शाया गया है कि आपसी सहयोग की प्रवृत्ति जो मनुष्य को सुदीर्घ विकास-क्रम के दौरान उत्तराधिकार स्वरूप प्राप्त हुई, उसका हमारे आधुनिक व्यक्तिवादी समाज में भी अत्यन्त महत्त्व है। विश्व की महानतम कृतियों में शुमार यह कृति हमेशा ही समाजवैज्ञानिकों और विचारकों की दिलचस्पी का विषय रही है। आज भी इस पुस्तक की लोकप्रियता उतनी ही है जितनी लगभग एक सदी पहले थी, जब यह पहली बार पाठकों के सामने आई थी।

    पृष्ठ-196 रु150

     

    150.00
  • 25 ग्लोबल ब्रांड – प्रकाश बियाणी

    195.00
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    25 ग्लोबल ब्रांड – प्रकाश बियाणी

    25 ग्लोबल ब्रांड
    प्रकाश बियाणी

    ब्रांड यानी उत्पाद विशेष का नाम…एक ट्रेडमार्क।

    वेबस्टर्स शब्दावली के अनुसार ब्रांड यानी… A mark burned on the skin with hot iron.

    हिन्दी में इसका भावार्थ है : व्यक्ति के शरीर पर उसकी पहचान दाग देना।

    यही इस पुस्तक का सार है।

    ब्रांड किसी उत्पाद का केवल नाम ही नहीं होता। उसके उत्पाद का पेटेंटेड ट्रेडमार्क भी नहीं होता। ग्राहक जब ब्रांडेड उत्पाद खरीदता है तो वह इस विश्वास का मूल्य भी चुकाता है कि उत्पाद गुणवत्तायुक्त होगा, झंझटमुक्त लम्बी सेवा प्रदान करेगा और उसे वादे के अनुसार बिक्री बाद सेवा मिलेगी। दूसरे शब्दों में, ब्रांडेड उत्पादों के निर्माता केवल वस्तु का मूल्य प्राप्त नहीं करते। वे एक भरोसे, एक विश्वास की क़ीमत भी वसूल करते हैं। वही ब्रांड लम्बी पारी खेलते हैं, जो अपने पर ‘दाग’ दी गई ‘पहचान’ को एक बार नहीं, बार-बार भी नहीं, बल्कि हर बार सही साबित करते हैं। ऐसे ही शतकीय पारी के बाद ग्लोबल मार्किट में आज भी अव्वल 25 ग्लोबल ब्रांड का इतिहास इस पुस्तक में सँजोया गया है।

    पृष्ठ-169 रु195

    195.00
  • शुन्य से शिखर – प्रकाश बियाणी

    295.00
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    शुन्य से शिखर – प्रकाश बियाणी

    शुन्य से शिखर
    प्रकाश बियाणी

    देश की अर्थव्यवस्था को लाइसेंसी राज की बेड़ियों से मुक्त कराकर आर्थिक स्वतंत्रता के वैश्विक रास्ते पर ले जानेवाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं—‘दुनिया में लोग चीन की तरक़्क़ी से आशंकित होते हैं, लेकिन इसके विपरीत भारत की आर्थिक तरक़्क़ी को सकारात्मक नज़रिए से देखते हैं…’

    व्हार्टन स्कूल ऑफ़ द यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिल्वेनिया के प्रोफ़ेसरों के अध्ययन का निष्कर्ष है—‘वैश्विक आर्थिक मन्दी के दौरान भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने बेहतर प्रदर्शन किया, क्योंकि भारतीय उद्योगपतियों के कामकाज का अपना तौर-तरीक़ा है…।

    कभी विदेशी उद्योगपति हमारी कम्पनियाँ ख़रीदते थे, आज भारतीय ‘कॉरपोरेट-हाट’ के बड़े सौदागर हैं। यहाँ तक कि कभी भारत पर राज करनेवाली ईस्ट इंडिया कम्पनी के नए मालिक हैं—मुम्बई में जन्में उद्योगपति संजीव मेहता…।

    ऐसी सकारात्मक सच्चाइयों से प्रेरित इस पुस्तक ‘शून्य से शिखर’ में इंडियन कॉरपोरेट्स’ में 35 भारतीय उद्योगपतियों की यशोगाथा दोहराई गई है, जो साबित करती है कि भारतीय ठान लें तो कुछ भी कर सकते हैं, वह भी दूसरों से बेहतर।

    पृष्ठ-356 रु295

    295.00
  • खदान से ख़्वाबों तक : संगमरमर – प्रकाश बियाणी

    300.00
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    खदान से ख़्वाबों तक : संगमरमर – प्रकाश बियाणी

    खदान से ख़्वाबों तक : संगमरमर
    प्रकाश बियाणी

    पत्थर न केवल बोलते हैं, वरन् ख़ूब मीठा बोलते हैं। यही नहीं, पत्थर मनुष्य से ज़्यादा धैर्यवान व सहनशील हैं। पत्थरों का बाह्य आवरण जितना सख़्त व निर्मम है, उनका अन्तर्मन उतना ही कोमल व उदार है। बिलकुल श्रीफल की तरह।

    परिस्थितियों के साथ बदलने में तो पत्थरों का कोई सानी ही नहीं है। हाँ, वे ज़रूरत से ज़्यादा स्वाभिमानी और स्वावलम्बी हैं, अत: उन्हें सावधानी व मज़बूती से भू-गर्भ से निकालना व सँवारना पड़ता है।

    पत्थर आसानी से अपना रंगरूप नहीं बदलते, पर एक बार जो बदलाव स्वीकार कर लेते हैं, उसे स्थायी रूप से आत्मसात् कर लेते हैं। हम सबने देखा है कि पत्थर जब किसी भवन की नींव बनते हैं तो सहस्रों साल के लिए स्थितप्रज्ञ (समाधि में लीन) हो जाते हैं। पत्थर अत्यन्त मज़बूत व मेहनती हैं और दूसरों से भी ऐसी ही अपेक्षा करते हैं।

    याद करें, पाषाण युग। दस हज़ार साल पहले मनुष्य पशुवत् जीवन जी रहा था। पत्थरों ने ही उसे सलीक़े से जीने व ज़िन्दा रहने के लिए संघर्ष करना सिखाया। यही नहीं, पत्थर ही मनुष्य के पहले मित्र-परिजन व शुभचिन्तक बने। पत्थरों ने मनुष्य को हथियार बनकर सुरक्षा प्रदान की। पत्थरों की मदद से शिकार करके ही मनुष्य ने अपना पेट भरा। आभूषण बन पत्थरों ने मनुष्य को सजाया व सँवारा। फ़र्श व छत बन उन्हें प्रकृति के प्रकोप से बचाया। पत्थरों ने ही मानव समुदाय को वैभव व कीर्ति प्रदान की है। वस्तुत: पत्थर ही वह नींव (बुनियाद) हैं, जिन पर क़दमताल करते हुए मनुष्य सभ्य हुआ और आज आकाश में उड़ान भर रहा है। पत्थरों की धरती माँ की कोख में प्रसव पीड़ा से उनके हम तक पहुँचने की दिलचस्प कहानी है यह पुस्तक।

    पृष्ठ-170 रु300

    300.00
  • लोकल से ग्लोबल – प्रकाश बियाणी

    350.00
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    लोकल से ग्लोबल – प्रकाश बियाणी

    लोकल से ग्लोबल
    प्रकाश बियाणी

    हाँ, हम तैयार हैं…

    —देश की अर्थव्यवस्था को लाइसेंसी राज की बेड़ियों से मुक्त कराकर आर्थिक स्वतंत्रता के वैश्विक रास्ते पर ले जानेवाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं—‘दुनिया में लोग चीन की तरक़्क़ी से आशंकित होते हैं, लेकिन इसके विपरीत भारत की आर्थिक तरक़्क़ी को सकारात्मक नज़रिये से देखते हैं…’

    —व्हार्टन स्कूल ऑफ़ द यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिल्वेनिया के चार प्रोफ़ेसरों के अध्ययन का निष्कर्ष है—‘वैश्विक आर्थिक मन्दी के दौरान भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने बेहतर प्रदर्शन किया क्योंकि वहाँ के उद्योगपतियों के कामकाज का अपना तौर-तरीक़ा है…’

    —भारतीय अर्थव्यवस्था सन् 2020 में तीन ट्रिलियन डॉलर होगी…

    —कभी विदेशी उद्योगपति हमारी कम्पनियाँ ख़रीदते थे, आज भारतीय ‘कॉरपोरेट-हाट’ के बड़े सौदागर हैं। यहाँ तक कि कभी भारत पर राज करनेवाली ईस्ट इंडिया कम्पनी के नए मालिक हैं—मम्बई में जन्मे उद्योगपति संजीव मेहता…

    ऐसी सकारात्मक सच्चाइयों से प्रेरित इस पुस्तक ‘लोकल से ग्लोबल : इंडियन कॉरपोरेट्स’ में उदारीकरण के दूसरे दशक (2001-2010) में भारतीय उद्योग जगत की ֹ‘लोकल से ग्लोबल’ बनने की सफल कोशिश दोहराई गई है। यह पुस्तक उन पचास भारतीयों की यशोगाथा है, जिन्होंने साबित किया है कि भारतीय ठान लें तो कुछ भी कर सकते हैं, वह भी दूसरों से बेहतर।

    पृष्ठ-503 रु350

    350.00
  • An Endless Travel – दिवाकर गोयल

    250.00
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    An Endless Travel – दिवाकर गोयल

    An Endless Travel
    दिवाकर गोयल

    It is quite fascinating to conceive an idea “one can always remain young”, it is our emotional and psychological state of mind which makes us old. In fact, it is the planning for the life cycles in advance which makes the miraculous difference. In European and many other Asian countries, it is adopted as a natural business. It is essential to realize and recognize the need for emotional and psychological stability. Since our expectations, sensibilities, personalities, sensitivity level, concept of empathy all undergo a sea change, therefore, we need to have proper planning as a matter of mental preparedness for physical, emotional and psychological changes in our thinking process. This wonderful book ‘An Endless Travel’ by Dewakar Goel is an easy and friendly roadmap towards the long journey on an endless road, which is going to be a landmark because of its unique features of relating each concept with the real life situation where a reader may be able to identify himself.

    पृष्ठ-212 रु250

    250.00
  • बीमा सिद्धान्त एवं व्यवहार – एम.एन. मिश्र

    695.00
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    बीमा सिद्धान्त एवं व्यवहार – एम.एन. मिश्र

    बीमा सिद्धान्त एवं व्यवहार
    एम.एन. मिश्र

    ‘बीमा सिद्धान्त एवं व्यवहार’ पुस्तक भारत में अपने स्तर की हिन्दी में एक सफल पुस्तक है, जिसे विभिन्न विश्वविद्यालयों और सेवा आयोगों में मान्यता प्राप्त है। इस पुस्तक में बीमा के समस्त अंगों को शामिल किया गया है। इसमें पाँच भाग हैं। प्रथम भाग परिचय का है जिसके अन्तर्गत परिभाषा, स्वभाव, विकास, बीमा प्रसंविदा का वर्णन है। भाग दो जीवन बीमा का है जिसमें जीवन बीमा प्रसंविदा, बीमापत्र के भेद, वृत्तियाँ, बीमापत्र की शर्तें, जीवन बीमा की आवश्यकता एवं महत्त्व, पिछड़े वर्ग का जीवन बीमा, बीमा कराने की विधि एवं चुनाव, मृतक तालिका, प्रव्याजि निर्धारण, अधो-प्रामाणिक जीवन का बीमा, संचय, कोष का विनियोग, समर्पित मूल्य, मूल्यांकन एवं अतिरेक वितरण, जीवन बीमा का पुनर्बीमा और जीवन बीमा की प्रगति का वर्णन है। निजी क्षेत्रों में बीमा के योगदान का भी विश्लेषण है। तृतीय भाग में सामुद्रिक बीमा के विभिन्न पहलुओं, जैसे—बीमा का प्रसंविदा, सामुद्रिक बीमा के भेद, वाक्यांश, हानियाँ, सामुद्रिक बीमा में प्रव्याजि निर्धारण और वापसी और सामुद्रिक बीमा की प्रगति का विशद विश्लेषण है। अग्नि बीमा के महत्त्वपूर्ण अंग, जैसे-परिचय, प्रसंविदा, बीमापत्र के भेद, शर्तें, प्रव्याजि निर्धारण, पुनर्बीमा, क्षतिपूर्ति निर्धारण एवं भुगतान और अग्नि बीमा की प्रगति का भाग चार में वर्णन है। भाग पाँच में विविध बीमा एवं बीमा अधिनियम का वर्णन है। इसमें महत्त्वपूर्ण बीमा, जैसे-चोरी बीमा, मोटर बीमा, फ़सल, पशु और लाभ बीमा, मशीन बीमा, निर्यात बीमा, युद्ध जोखिम बीमा और प्रगति का विश्लेषण है। अधिनियमों में बीमा अधिनियम, 1938; जीवन बीमा अधिनियम, 1956; सामुद्रिक बीमा अधिनियम, 1963; सामान्य बीमा अधिनियम (राष्ट्रीयकरण) 1972; बीमा नियमन और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 2000 और उसके प्रत्यंगों का विशेष रूप से वर्णन है। इस पुस्तक के अध्ययन से छात्र बीमा व्यवसाय में सफल रोजगार प्राप्त कर सकते हैं। कार्यशील बीमाकर्त्ताओं की समस्याओं का समाधान इसके माध्यम से किया जा सकता है। बीमा अधिकारियों को नई सोच की दिशा मिल सकती है।

    पृष्ठ-718 रु695

    695.00
  • बीमा प्रबन्धन एवं प्रशासन – एम.एन. मिश्र

    650.00
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    बीमा प्रबन्धन एवं प्रशासन – एम.एन. मिश्र

    बीमा प्रबन्धन एवं प्रशासन
    एम.एन. मिश्र

    बीमा प्रबन्ध एवं प्रशासन’ बीमा व्यवसाय के सफल संचालन की एकमात्र पुस्तक है। इसे गहन शोध और विस्तृत अध्ययन के बाद लिखा गया है। बीमा व्यवसाय का प्रबन्धन एवं निर्देशन कैसे किया जाए, इस पुस्तक के अध्ययन से पता लग सकता है।

    इस पुस्तक में सात खंड हैं जो विभिन्न कार्यक्षेत्रों के संचालन में सहायक हैं। बीमा परिचय, प्रबन्ध एवं प्रशासन को प्रथम खंड में दिया गया है, जिसमें बीमा की परिभाषा एवं स्वभाव, बीमा का विकास एवं संगठन, बीमा प्रसंविदा, प्रबन्ध, प्रशासन एवं संगठन, जीवन बीमा निगम संगठन का रूप, सामान्य बीमा निगम, जीवन बीमा प्रसंविदा, सामुद्रिक बीमा प्रसंविदा और अग्नि बीमा परिचय एवं प्रसंविदा का वर्णन है। द्वितीय खंड में कार्यालय संगठन और प्रबन्ध की विवेचना है, जिसमें कार्यालय अभिन्यास एवं कार्य-दशाएँ, कार्यालय फर्नीचर, उपकरण एवं मशीनें, कार्यालय पद्धति, कार्यालय संगठन और कार्यालय प्रबन्ध का वर्णन है। कायिक प्रबन्ध का विश्लेषण तृतीय खंड में है जिसमें कार्यालय कार्यकर्त्ता प्रबन्धन, विक्रय संगठन एवं प्रबन्ध, अभिकर्त्ता की नियुक्ति, अभिकर्त्ता का प्रशिक्षण, पर्यवेक्षण एवं प्रेरणा और अभिकर्त्ता का नियंत्रण बताया गया है। चतुर्थ खंड विपणन का है जिसमें विक्रय-कार्यकर्त्ताओं का संगठन, कार्यक्षेत्रीय कार्यकर्त्ताओं के गुण, बीमा विक्रय विधि, प्रचार एवं तर्क, आक्षेपों का उत्तर, बीमा जब्‍ती नए व्यापार का अभिगोपन, बीमा कराने की विधि एवं चुनाव, बीमापत्र की शर्तें, नवकरण विधियों के प्रबन्ध का वर्णन है। पंचम खंड बीमापत्रधारियों की सेवा का है जिसमें बीमापत्रधारियों की सेवा, अध्यर्थन का भुगतान का वर्णन है। वित्तीय प्रबन्ध का वर्णन षष्ठम खंड में है जिसमें प्रव्याजि निर्धारण, कोष का प्रबन्ध, मूल्यांकन, संचय, कोष का विनियोग, लागत नियंत्रण, अंकेक्षण एवं परीक्षण का विवरण है। सप्तम खंड में बीमा अधिनियम एवं प्रसंविदा, जैसे—बीमा अधिनियम, 1938, जीवन बीमा अधिनियम, 1956, सामुद्रिक बीमा अधिनियम, 1963, सामान्य बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण, 2000 का विशद विश्लेषण है।

    यह पुस्तक वर्तमान अर्थव्यवस्था के विकास और विस्तृतीकरण में मील का पत्थर है। यह पुस्तक आनेवाले समय में बीमा की विभिन्न समस्याओं के समाधान की गीता है जिसके विभिन्न सिद्धान्तों का उपयोग करके कठिन-से-कठिन समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

    पृष्ठ-632 रु650

    650.00
  • उत्कृष्ट प्रबंधन के रूप – सुरेश कांत

    125.00
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    उत्कृष्ट प्रबंधन के रूप – सुरेश कांत

    उत्कृष्ट प्रबंधन के रूप
    सुरेश कांत

    प्रबन्धन आत्म-विकास की एक सतत प्रक्रिया है। अपने को व्यवस्थित-प्रबन्धित किए बिना आदमी दूसरों को व्यवस्थित-प्रबन्धित करने में सफल नहीं हो सकता, चाहे वे दूसरे लोग घर के सदस्य हों या दफ़्तर अथवा कारोबार के। इस प्रकार आत्म-विकास ही घर-दफ़्तर, दोनों की उन्नति का मूल है। इस लिहाज़ से देखें, तो प्रबन्धन का ताल्लुक़ कम्पनी-जगत के लोगों से ही नहीं, मनुष्य मात्र से है। वह इनसान को बेहतर इनसान बनाने की कला है, क्योंकि बेहतर इनसान ही बेहतर कर्मचारी, अधिकारी, प्रबन्धक या कारोबारी हो सकता है।

    ‘उत्कृष्ट प्रबन्धन के रूप’ को विषयानुसार चार उपखंडों में विभाजित किया गया है : स्व-प्रबन्धन, नेतृत्व-कला, औद्योगिक सम्बन्ध तथा कॉरपोरेट-संस्कृति। प्रबन्धन कौशल के विशेषज्ञ लेखक ने इस पुस्तक में आत्मसम्मान, वैचारिक स्पष्टता, सफलता और विफलता की अवधारणा, व्यावसायिक निर्णय-प्रक्रिया में धैर्य और प्राथमिकता-क्रम की अहमियत, रचनात्मक दृष्टिकोण, प्रबन्धन के मानवीय पहलू, कर्मचारियों में सकारात्मक नज़रिया तथा प्रतिभा का सदुपयोग आदि बिन्दुओं पर व्यावहारिक कोण से विचार किया है।

    प्रबन्धन के विद्यार्थियों और आम पाठकों के लिए एक मार्गदर्शक पुस्तक।

    पृष्ठ-184 रु125

    125.00
  • सफल प्रबंधन के गुर – सुरेश कांत

    125.00
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    सफल प्रबंधन के गुर – सुरेश कांत

    सफल प्रबंधन के गुर
    सुरेश कांत

    प्रबन्धन आत्म-विकास की एक सतत प्रक्रिया है। अपने को व्यवस्थित-प्रबन्धित किए बिना आदमी दूसरों को व्यवस्थित-प्रबन्धित करने में सफल नहीं हो सकता, चाहे वे दूसरे लोग घर के सदस्य हों या दफ़्तर अथवा कारोबार के। इस प्रकार आत्म-विकास ही घर-दफ़्तर, दोनों की उन्नति का मूल है। इस लिहाज़ से देखें, तो प्रबन्धन का ताल्लुक़ कम्पनी-जगत के लोगों से ही नहीं, मनुष्य मात्र से है। वह इनसान को बेहतर बनाने की कला है, क्योंकि बेहतर इनसान ही बेहतर कर्मचारी, अधिकारी, प्रबन्धक या कारोबारी हो सकता है।

    ‘सफल प्रबन्धन के गुर’ में कार्य-स्वीकृति यानी ‘वर्क कल्चर’, ‘बिक्री, विपणन और नेगोशिएशन’ तथा ‘नेतृत्व-कौशल’ शीर्षक उपखंडों में ईमानदारी, दफ़्तरी राजनीति, सहकर्मियों के पारस्परिक सम्बन्धों, व्यक्तिगत कार्यकुशलता, कार्य के प्रति प्रतिबद्धता, ग्राहक से सम्बन्ध, मार्केटिंग और व्यावसायिक साख आदि बिन्दुओं पर विचार करते हुए नेतृत्व-कौशल के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला गया है।

    आत्मविकास और प्रबन्धन की एक व्यावहारिक निर्देशिका।

    पृष्ठ-176 रु125

    125.00
  • कुशल प्रबंधन के सूत्र – सुरेश कांत

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    कुशल प्रबंधन के सूत्र – सुरेश कांत

    कुशल प्रबंधन के सूत्र
    सुरेश कांत

    ‘कुशल प्रबन्धन के सूत्र’ पर सुरेश कांत के दैनिक ‘अमर उजाला कारोबार’ में हर मंगलवार को प्रकाशित होनेवाले लोकप्रिय साप्ताहिक प्रबन्धन–कॉलम में छपे लेखों में से 40 चुने हुए लेखों का संकलन है। इन लेखों में हिन्दी में पहली बार प्रबन्धन के विभिन्न पहलुओं पर अत्यन्त रोचक और प्रभावशाली ढंग से प्रकाश डाला गया है। स्व–प्रबन्धन, कर्मचारी–प्रबन्धन, कार्यालय–प्रबन्धन, समय–प्रबन्धन, व्यक्तित्व–विकास, औद्योगिक सम्बन्ध, नेतृत्व–कला, कौशल–विकास आदि सभी पक्षों पर इनमें इतने सरल, सुबोध और आकर्षक तरीक़े से चर्चा की गई है कि पाठक लेखक के साथ बह चलता है। प्रबन्धन उसके लिए पराया अथवा दुरूह विषय नहीं रह जाता।

    प्रबन्धन लेखक की नज़र में व्यक्तित्व के सतत विकास और जीवन में निरन्तर प्रगति की प्रक्रिया है। आदमी अपना ही परिष्कार न कर सके, अपने घर–परिवार की ही उन्नति न कर सके, तो वह कारोबार या दफ़्तर की प्रगति कैसे सुनिश्चित कर सकेगा? वह अपने को ही न सँभाल सके, तो दूसरों को—कर्मचारियों, ग्राहकों आदि को—क्या सँभाल सकेगा? अच्छा आदमी ही अच्छा कर्मचारी, अधिकारी या प्रबन्धक हो सकता है। अत: प्रबन्धन छात्रों, शोधार्थियों, कारोबारियों, कर्मचारियों–अधिकारियों अथवा प्रबन्धकों से ही ताल्लुक़ नहीं रखता, आम आदमी से भी ताल्लुक़ रखता है। वह कम्पनी–जगत के ही मतलब की चीज़ नहीं, मनुष्य मात्र के मतलब की चीज़ है। वह आदमी को बेहतर आदमी बनाने की कला है।

    सुरेश कांत ने अपना लक्ष्य–समूह कॉरपोरेट–दुनिया के आदमी को ही नहीं, पूरी दुनिया के हर आदमी को मानकर इस विषय की प्रस्तुति की है। एक सफल, सिद्धहस्त रचनाकार होने के कारण वे इस विषय में लालित्य भरने में कामयाब रहे हैं। अपने विशद अध्ययन, गहरे ज्ञान और असरदार लेखन–शैली के बल पर वह इस विषय को हिन्दी में जन–जन में लोकप्रिय बनाने में सफल रहे हैं।

    आप चाहे कोई भी हों, इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप वही नहीं रह जाएँगे, जो आप इसे पढ़ने से पहले थे। एक बहुत ही ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक।

    पृष्ठ-168 रु150

    150.00
  • बोलना ही है – रवीश कुमार

    250.00
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    बोलना ही है – रवीश कुमार

    बोलना ही है
    रवीश कुमार

    रवीश कुमार की यह किताब ‘बोलना ही है’ इस बात की पड़ताल करती है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस-किस रूप में बाधित हुई है, परस्पर संवाद और सार्थक बहस की गुंजाइश कैसे कम हुई है और इससे देश में नफ़रत और असहिष्णुता को कैसे बढ़ावा मिला है। कैसे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि, मीडिया और अन्य संस्थान एक मज़बूत लोकतंत्र के रूप में हमें विफल कर रहे हैं। इन स्थितियों से उबरने की राह खोजती यह किताब हमारे वर्तमान समय का वह दस्तावेज़ है जो स्वस्थ लोकतंत्र के हर हिमायती के लिए संग्रहणीय है।

    हिन्दी में आने से पहले ही यह किताब अंग्रेज़ी, मराठी और कन्नड़ में प्रकाशित हो चुकी है।

    पृष्ठ-212 रु250

    250.00
  • भारत की शताब्दी – कमलनाथ

    600.00
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  • उपभोक्ता वस्तुओं का विज्ञान – रामचन्द्र मिश्र

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    उपभोक्ता वस्तुओं का विज्ञान – रामचन्द्र मिश्र

    उपभोक्ता वस्तुओं का विज्ञान
    रामचन्द्र मिश्र

    प्रत्येक व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक अपने दैनिक जीवन में वस्तुतः उपभोक्ता होता है। उपभोक्ता वस्तुओं का प्रयोग सर्वव्यापक और नित्य क्रिया है। खाने-पीने की वस्तुओं और पहनने-ओढ़ने की चीज़ों से लेकर आवास, साफ़-सफ़ाई, सुरक्षा-बचाव, साज-सँवार तथा भोग-विलास से सम्बन्धित अनेकानेक वस्तुओं का दिन-रात निरन्तर प्रयोग किया जाता है।

    दैनिक उपयोग की वस्तुओं की गुणवत्ता, संघटन, विश्वसनीयता, उपयोग के लाभालाभ, सुरक्षा, पर्यावरणीय प्रभाव आदि आवश्यक तथ्यों यानी उपभोक्ता वस्तुओं के विज्ञान से उपभोक्ता प्रायः कम ही अवगत होते हैं। दूसरी तरफ़ बाज़ार की नई प्रवृत्ति ने उपभोक्ता वस्तुओं को नया रूप दिया है। अब उपभोक्ता विज्ञापन की चकाचौंध में घटिया वस्तुओं को भी वरण कर लेता है। इसकी वजह है उपभोक्ता जानकारी और मार्गदर्शन का अभाव।

    यह पुस्तक उपभोक्ता वस्तुओं के बारे में कही-सुनी बातों के बजाय हमें ठोस वैज्ञानिक जानकारी देती है जिसके आधार पर हम अपने उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं।

    पृष्ठ-268 रु150

    150.00
  • घर की व्यवस्था कैसे करें ? – रामकृष्ण

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    घर की व्यवस्था कैसे करें ? – रामकृष्ण

    घर की व्यवस्था कैसे करें ?
    रामकृष्ण

    संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार की अवधारणा ने घर के मायने ही बदल दिए हैं। पहले हम ज़्यादातर कामों के लिए घर के दूसरे सदस्यों पर निर्भर रहते थे, अब हमें स्वयं अपनी व्यवस्था करनी पड़ती है। ऐसे में अनेक छोटी-मोटी बातों का ध्यान रखना ज़रूरी हो जाता है, घर का सही प्रबन्धन न हो तो कभी-कभी छोटी-छोटी चीज़ों के लिए भी आपको पूरा दिन तनाव में गुज़ारना पड़ सकता है। दूसरी तरफ़ घरों में जगह की कमी के चलते भी घर की व्यवस्था करना कठिन होता जा रहा है। अब एक या दो कमरों में ही अपने सामान को व्यवस्थित करना पड़ता है। फिर घर की व्यवस्था करते समय घर के बाक़ी सदस्यों का भी ध्यान रखना होता है। यह पुस्तक हमें बताती है कि देखने में छोटी लगनेवाली इन बड़ी समस्याओं से कैसे निबटा जाए। महत्त्वपूर्ण काग़ज़ात को कैसे, कहाँ सँभालें। कपड़ों की साज-सज्जा, खान-पान का चुनाव, साफ़-सफ़ाई, फ़र्स्ट एड बॉक्स और ऐसी ही तमाम चीज़ों के समुचित प्रबन्धन की जानकारी इससे मिलती है।

    पृष्ठ-179 रु95

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  • उद्योग में सफलता के 36 मंत्र – डॉ. गिरीश पी. जाखोटिया

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    उद्योग में सफलता के 36 मंत्र – डॉ. गिरीश पी. जाखोटिया

    उद्योग में सफलता के 36 मंत्र
    डॉ. गिरीश पी. जाखोटिया

    उद्यमकला की नींव मज़बूत हो तभी इमारत मज़बूत होगी। उद्योग और उद्यमकला के लक्ष्य का निर्धारण कैसे किया जाता है यह हम ‘प्रैक्टिकली’ देखेंगे। मूलतः ‘उद्यमी’ ही होना और सम्पत्ति अर्जित करना है, इस बात का संकल्प करना उद्यमी के लिए जरूरी है। रिलायन्स के कर्ताधर्ता स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी का, ‘बड़ा बनने का नशा है।’ यह प्रिय घोष वाक्य था। अर्थात् सम्पत्ति कमाने की भी लत लगनी चाहिए। मूलतः उद्यमी होने के लिए पाँच कसौटियाँ हैं। उद्यमी बनने का निर्णय करने पर इन कसौटियों को पार करने के लिए उचित ‘अभ्यास’ करना आवश्यक है। कौन-सी हैं ये कसौटियाँ? ये कसौटियाँ हैं—सम्पत्ति अर्जित करने के लिए लगन, स्वभाव और आचार में लचीलापन, व्यवसाय प्रक्रिया के रहस्य की जानकारी, उद्योग की शृंखला, परस्पर सम्बन्ध निर्माण करने की तैयारी तथा बिना थके, बिना घबराए, बिना निराश हुए कोशिश करते रहने की मानसिक-शारीरिक-सांस्कृतिक तैयारी।

    पृष्ठ-151 रु125

    125.00
  • मैनेजमेंट सीखें महात्मा से – विजय जोशी

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    मैनेजमेंट सीखें महात्मा से – विजय जोशी

    मैनेजमेंट सीखें महात्मा से
    विजय जोशी

    प्रबन्धन आज बाक़ायदा एक शिक्षा-सरणी है जिसके तहत विद्यार्थी को कुछ निश्चित और सीमित अर्थों में प्रबन्धक के रूप में प्रशिक्षित किया जाता है। शायद इसी कारण आज हमारे कॉरपोरेट जगत में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के होलिस्टक विकास की कोई जगह नहीं रही।

    यह पुस्तक प्रबन्धन को उन आधारभूत नैतिक मूल्यों से जोड़ती है जो व्यावसायिक तथा व्यावहारिक कार्यों को भी विराटतर मानवीय हित के बड़े धरातल पर ले जा सकते हैं और इसके लिए इसमें महात्मा गांधी के जीवन तथा विचारों को आधार बनाया गया है।

    हम सभी जानते हैं कि गांधी स्वयं एक कुशल प्रबन्धक थे, और उन्होंने अपनी नेतृत्व-क्षमता से अकल्पनीय जनान्दोलनों को सम्भव बनाया। और इसके लिए उन्होंने कुछ ऐसे सूत्रों को अपने दैनिक जीवन में अपनाया, जिन्हें लोग हमेशा से जानते थे लेकिन उन पर उस निष्ठा तथा सच्चाई के साथ अमल नहीं करते थे जैसा महात्मा ने किया।

    झूठ से भरसक दूरी, अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारना, वचनबद्धता, हर काम को समान भाव से देखना, हर किसी से सीखने को तैयार रहना, श्रम का सम्मान करना, समय के मूल्य को समझना, और जब ज़रूरत हो अकेले चलने की हिम्मत जुटाना—यह कुछ बहुत साधारण मूल्य हैं जिन्हें बापू ने अपनाया। और ये एक अनूठे नेता के रूप में सबसे ज्‍़यादा चमके।

    यह पुस्तक बताती है कि यही बातें व्यवहार में लेकर हम आज अपने प्रबन्धनीय कौशल को प्रभावशाली बना सकते हैं।

    पृष्ठ-88 रु95

    95.00