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  • जातिप्रथा उन्मूलन और अन्य निबंध - बाबासाहेब अम्बेडकर

    जातिप्रथा उन्मूलन और अन्य निबंध – बाबासाहेब अम्बेडकर

    640.00
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    जातिप्रथा उन्मूलन और अन्य निबंध – बाबासाहेब अम्बेडकर

    जातिप्रथा उन्मूलन और अन्य निबंध
    बाबासाहेब अम्बेडकर

    कई किताबें है जाति व्यवस्था पे और हम इसे कैसे खत्म कर सकते हैं, इससे संबंधित हैं। लेकिन डॉ अम्बेडकर द्वारा लिखित “जातिप्रथा उन्मूलन” (Annihilation of Caste) आज तक के इस विषय पर सभी पुस्तकों सबसे उत्कृष्ट है। क्योंकि यह व्यवस्थित रूप से दिखाता है कि यह कैसे काम करता है, लोगों को उनका शोषण और अधीन में रखने के लिए के लिए जातियों में जातिप्रथा करते है।  वह हमें स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि सदियों से दुर्व्यवहार और शोषण के शिकार लोगों को मुक्त करने के लिए जाति व्यवस्था को अंत करना होगा।

    यह पुस्तक जाति व्यवस्था और अन्य प्रासंगिक विषयों पर अम्बेडकर के लेखन का एक श्रेष्ठ संग्रह है। जाति-मुक्त भारत के पक्ष में खड़े हर भारतीय को इसे पढ़ना चाहिए, क्योंकि यह बहुत सारी समझ और उपयोगी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

    Destruction of Caste System  / Jatipradha Unmulan

    पृष्ठ 592   रु640

    640.00
  • भारत का संविधान – हिंदी और अंग्रेजी संस्करण

    900.00
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    भारत का संविधान – हिंदी और अंग्रेजी संस्करण

    भारत का संविधान – हिंदी और अंग्रेजी में

    भारत का संविधान अब हिंदी और अंग्रेजी में । अथवा 2020 के 104वें संशोधन तक के नए संशोधनों को भी शामिल किया गया है। यह उन हिंदी पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया हैं जो हमारे संविधान को अपनी मातृभाषा (हिन्दी अथवा अंग्रेजी)में पढ़ना पसंद करते हैं।

    अद्यतन संस्करण, 2020 दिसंबर तक

    Constitution of India In English and Hindi. Updated up to 104th amendments of 2020
    (Print Edition)

    Bharat Ka Samvidhan / Bharat Ka Sanvidhan

    पृष्ठ 824   रु900

    900.00
  • उपभोक्ता अदालतें स्वरुप एवं सम्भावनाएँ – प्रेमलता

    95.00
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    उपभोक्ता अदालतें स्वरुप एवं सम्भावनाएँ – प्रेमलता

    उपभोक्ता अदालतें स्वरुप एवं सम्भावनाएँ
    प्रेमलता

    अपार सम्भावनाओं से भरा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लगभग एक समानान्तर न्याय व्यवस्था का स्वरूप ग्रहण करता जा रहा है। उपभोक्ता इस क़ानून से अनभिज्ञ नहीं रह गया है तथापि इन अदालतों के स्वरूप, न्याय-प्रक्रिया आदि की विधिवत् जानकारी के लिए अभी अपेक्षित पद्धति विकसित नहीं हो पाई है। कुछ ग़ैर-सरकारी संस्थाएँ इस दिशा में मुखर हैं व इस अधिनियम के दैनंदिन सशक्तीकरण का बहुत श्रेय इन संस्थाओं को जाता है, किन्तु अब स्थिति यह नहीं रही कि केवल जन-जागृति से ही सन्तोष कर लिया जाए। आवश्यकता अब इस बात की भी है कि उपभोक्ता क़ानूनों की शिक्षा भी अब विधिवत् रूप से शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से दी जाए। इस आवश्यकता को सभी स्तरों पर अनुभव किया जा रहा है।

    इस पुस्तक के माध्यम से एक छोटा-सा प्रयास किया गया है कि हम उपभोक्ता के पास जा सकें, उन्हें यह सामान्य जानकारी दे सकें कि वास्तव में उपभोक्ता अदालतें हैं क्या? जब हम यह दावा करते हैं कि उपभोक्ता न्यूनतम ख़र्च करके बिना वकीलों के सहयोग के अपनी बात अपनी भाषा में स्वयं इस अदालत में रख सकता है तो उपभोक्ता के लिए पहली आवश्यकता यह जानने की हो जाती है कि कैसे और कहाँ? इन सभी प्रश्नों के समाधान के लिए इस पुस्तक को कैसे और कहाँ से ही प्रारम्भ किया गया है और फिर क्या-क्या, कितने विषय, कैसी शिकायतें—सब जानकारियों को सिलसिलेवार देने का प्रयास किया गया है।

    पृष्ठ 151 रु95

    95.00
  • तीन तलाक की मीमांसा – अनूप बरनवाल

    195.00
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    तीन तलाक की मीमांसा – अनूप बरनवाल

    तीन तलाक की मीमांसा
    अनूप बरनवाल

    तलाक़ एवं इससे जुड़े विषय—हलाला, बहुविवाह की पवित्र क़ुरान और हदीस के अन्तर्गत वास्तविक स्थिति क्या है? वैश्विक पटल पर, ख़ास तौर से मुस्लिम देशों में तलाक़ से सम्बन्धित क़ानूनों की क्या स्थिति है? भारत में तलाक़ की व्यवस्था के बने रहने के सामाजिक एवं राजनीतिक प्रभाव क्या हैं? महिलाओं के सम्पत्ति में अधिकार से वंचित बने रहने का तलाक़ से क्या सम्बन्ध हैं ? तलाक़ के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के विचारों की क्या प्रासंगिकता है? धार्मिक आस्था एवं व्यक्तिगत क़ानून के मूल अधिकार के होने या न होने का तलाक़ पर क्या प्रभाव है? कांग्रेस सरकार द्वारा तलाक़ोपरान्त भरण-पोषण पर और भाजपा सरकार द्वारा तीन तलाक़ पर लाए गए कानून के क्या प्रभाव हैं? तलाक़ की समस्या का भारतीय परिपेक्ष्य में समाधान क्या है? तलाक़ से जुड़े ऐसे सवालों के सभी पहलुओं पर विश्लेषण करने का प्रयास इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है।

    ब्रिटिश हुकूमत द्वारा शरीयत अनुप्रयोग क़ानून, 1937 के माध्यम से जिस धार्मिक दुराग्रह का ज़हर घोलने का प्रयास किया गया था, उससे मुक्ति दिलाने में हमारे नीति-निर्माता आज़ादी के इतने वषों बाद भी असफ़ल रहे हैं। जबकि संविधान-निर्माताओं द्वारा इससे मुक्ति का रास्ता बताया गया है। वह है धर्मनिरपेक्षता के आईने से एक यूनिफ़ॉर्म सिविल संहिता बनाकर लागू करने का रास्ता। हम सब इस रास्ते की ओर आगे तो बढे, किन्तु महज़ पाँच वर्ष बाद ही हिन्दू क़ानून में सुधार पर आकर अटल गए। मुस्लिम, ईसाई सहित सभी धर्मों के व्यक्तिगत क़ानूनो में सुधार कर एक समग्र व सर्वमान्य सिविल संहिता बनाने की इच्छाशक्ति नहीं जुटा सके, जिसका ख़ामियाज़ा इस देश को भुगतते रहना होता है। भारत में तीन तलाक़ की समस्या का मूल इसी में छिपा है, जिसका विश्लेषणात्मक अध्ययन करना भी इस पुस्तक का विषय है ।

    पृष्ठ 184 रु195

    195.00
  • समान नागरिक संहिता : चुनौतियाँ और समाधान – अनूप बरनवाल

    275.00
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    समान नागरिक संहिता : चुनौतियाँ और समाधान – अनूप बरनवाल

    समान नागरिक संहिता : चुनौतियाँ और समाधान
    अनूप बरनवाल

    इस पुस्तक में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान बने धर्मनिरपेक्ष क़ानूनों का समान नागरिक संहिता के सन्दर्भ में महत्त्व; अनुच्छेद 44 पर संविधान सभा में किए गए बहस की प्रासंगिकता; सुप्रीम कोर्ट द्वारा समान नागरिक संहिता के पक्ष में दिए गए निर्णयों के महत्त्व; नीति-निर्माताओं द्वारा हिन्दू क़ानून (1955) या भरण-पोषण क़ानून (1986) या तीन तलाक़ क़ानून (2017) बनाते समय और विधि आयोग द्वारा अपनी रिपोर्ट (2018) प्रस्तुत करते समय खो दिए गए अवसर के प्रभाव का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।

    विश्व के प्रमुख सिविल संहिताओं जैसे फ्रांस, जर्मन, स्विस, टर्की, पुर्तगाल, गोवा सिविल संहिता का उल्लेख करते हुए पुस्तक में ‘इक्कीस सूत्री मार्गदर्शक सिद्धान्त’ का प्रतिपादन किया गया है। इसके आधार पर एक सर्वमान्य ‘भारतीय सिविल संहिता’ बनाया जा सकता है। संविधान निर्माताओं की मंशा के अनुरूप प्रस्तावित समान नागरिक संहिता को व्यापकता के साथ प्रस्तुत किया गया है, जिसमें व्यक्ति, परिवार एवं सम्पत्ति सम्बन्धी विषयों के साथ राष्ट्रीयता सम्बन्धी विषय शामिल हैं।

    पुस्तक में ‘भारत राष्ट्र हमारा’ के रूप में राष्ट्रगान, ‘चक्रध्वज’ के रूप में राष्ट्रीय ध्वज के अतिरिक्त राष्ट्रभाषा, राष्ट्रीय पर्व और राष्ट्रीय दिवस, राष्ट्रीय सम्मान, भारतीय नागरिकता रजिस्टर, राष्ट्रपरक उपनाम जैसे विषयों की संविधान के अनुरूप व्यापक दृष्टिकोण के साथ व्याख्या की गई है।

    भारत में लागू सभी व्यक्तिगत क़ानूनों; यथा—हिन्दू क़ानून, मुस्लिम क़ानून, ईसाई क़ानून, पारसी क़ानून में मौजूद सभी विसंगति वाले विषयों जैसे बहुविवाह, विवाह-उम्र, मौखिक विवाह-विच्छेद (तलाक़), हलाला, उत्तराधिकार, वसीयत, गोद, अवयस्कता, जनकता, दान, मेहर, भरण-पोषण, महिलाओं की सम्पत्ति में अधिकार, आर्थिक अराजकता का विश्लेषण कर इनका धर्मनिरपेक्ष समाधान इस पुस्तक में दिया गया है।

    पृष्ठ 356 रु275

    275.00
  • RTI कैसे आई ! – अरुणा रॉय

    299.00
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    RTI कैसे आई ! – अरुणा रॉय

    RTI कैसे आई
    अरुणा रॉय  

    ‘‘ब्यावर की गलियों से उठकर राज्य की विधानसभा से होते हुए संसद के सदनों और उसके पार विकसित होते एक जन आन्दोलन को मैंने बड़े उत्साह के साथ देखा है। यह पुस्तक, अपनी कहानी की तर्ज पर ही जनता के द्वारा और जनता के लिए है। मैं ख़ुद को इस ताक़तवर आन्दोलन के एक सदस्य के रूप में देखता हूँ।’’ —कुलदीप नैयर; मूर्धन्य पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता। ‘‘यह कहानी हाथी के ख़िलाफ़ चींटियों की जंग की है। ‘एमकेएसएस’ ने चींटियों को संगठित करके राज्य को जानने का अधिकार क़ानून बनाने के लिए बाध्य कर डाला। गोपनीयता के नाम पर हाशिये के लोगों को हमेशा अपारदर्शी व सत्ता-केन्द्रित राज्य का शिकार बनाया गया लेकिन वह ज़मीन की ताक़त ही थी जिसने संसद को यह क़ानून गठित करने को प्रेरित किया जैसा कि हमारे संविधान की प्रस्तावना में निहित है, यह राज्य ‘वी द पीपल’ (जनता) के प्रति जवाबदेह है। पारदर्शिता, समता और प्रतिष्ठा की लड़ाई आज भी जारी है…।’’ —बेजवाड़ा विल्सन; ‘सफ़ाई कर्मचारी आन्दोलन’ के सह-संस्थापक, ‘मैग्सेसे पुरस्कार’ से सम्मानित। ‘‘यह एक ऐसे क़ानून के जन्म और विकास का ब्योरा है जिसने इस राष्ट्र की विविधताओं और विरोधाभासों को साथ लेते हुए भारत की जनता के मानस पर ऐसी छाप छोड़ी है जैसा भारत का संविधान बनने से लेकर अब तक कोई क़ानून नहीं कर सका। इसे मुमकिन बनानेवाली माँगों और विचारों के केन्द्र में जो भी लोग रहे, उन्होंने इस परिघटना को याद करते हुए यहाँ दर्ज किया है…यह भारत के संविधान के विकास के अध्येताओं के लिए ही ज़रूरी पाठ नहीं है बल्कि उन सभी महत्त्वाकांक्षी लोगों के लिए अहम है जो इस संकटग्रस्त दुनिया के नागरिकों के लिए लोकतंत्र के सपने को वास्तव में साकार करना चाहते हैं।’’ —वजाहत हबीबुल्ला; पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त, केन्द्रीय सूचना आयोग। ‘‘देश-भर के मज़दूरों और किसानों के लिए न्याय व समता के प्रसार में बीते वर्षों के दौरान ‘एमकेएसएस’ का काम बहुमूल्य रहा है। इस किताब को पढऩा एक शानदार अनुभव से गुज़रना है। यह आरम्भिक दिनों से लेकर अब तक क़ानून के विकास की एक कहानी है। इस कथा में सक्रिय प्रतिभागी जो तात्कालिक अनुभव लेकर सामने आते हैं, वह आख्यान को बेहद प्रासंगिक और प्रभावी बनाता है।’’ —श्याम बेनेगल; प्रतिष्ठित फ़िल्मकार और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध नागरिक। ‘‘हाल के वर्षों में आरटीआइ सर्वाधिक अहम क़ानूनों में एक रहा है। इसे यदि क़ायदे से लागू किया जाए तो इसका इस्तेमाल शहरी और ग्रामीण ग़रीबों को उनकी ज़िन्दगी के बुनियादी हक़ दिलवाने और कुछ हद तक सामाजिक न्याय सुनिश्चित कराने में किया जा सकता है।’’ —रोमिला थापर; सुप्रसिद्ध इतिहासकार।

    पृष्ठ 343 रु299

    299.00
  • उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकारी – अरविन्द जैन

    150.00
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    उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकारी – अरविन्द जैन

    उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकारी
    अरविन्द जैन

    “यह पुस्तक पितृसत्ता की लगभग सभी वैधानिक और संवैधानिक अभिव्यक्तियों पर लिपटे आवरणों को तार-तार करती जाती है। विधि सम्बन्धी स्त्री-विमर्श दीर्घकालीन संघर्ष में महत्त्वपूर्ण औज़ार की तरह इस्तेमाल हो सकता है।”

    —(‘हंस’; जून, 2000)

    “ ‘उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार’ पढ़कर स्वयं को एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की आधुनिक नारी समझने का नशा हिरण हो जाता है। विश्वसुन्दरी, अधिकारी, प्रबन्धक, वर्किंग वूमेन या घर की लक्ष्मी, जो भी हो, तुम होश में आओ…इस किताब को पढ़ो; आधुनिक, आज़ादी और बराबरी के सारे दावों की हवा निकल जाएगी। यह किताब ख़ौफ़नाक तथ्यों की तह तक उजागर करती है।”

    —(‘नई दुनिया’, इन्दौर; 8 जुलाई, 2000)

    “इस पूरी पुस्तक को पढ़ने पर अरविन्द की यह बात सही मालूम होती है कि बीसवीं सदी के आरम्भ से लेकर अब तक अदालत, क़ानून और न्याय की भाषा-परिभाषा मूलत: स्त्री के प्रति अविश्वास, घृणा और अपमान से उपजी भाषा है।”

    —(‘साक्षात्कार’, अगस्त, 2000)

    “इस पुस्तक ने औरत की पक्षधर लोकतंत्र की चार सत्ताओं को बेनक़ाब कर दिया। इसने इस तथ्य को पुन: स्थापित किया कि पुरुष नि:स्वार्थ भाव से, पुरुष दमन से मुक़ाबले के लिए, औरत का रक्षाकवच और उसके दमन के विरुद्ध लावा बन सकता है।

    —(‘दैनिक नवज्योति’, जयपुर; 16 सितम्बर, 2000)

    पृष्ठ-160 रु150

     

    150.00
  • बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री – अरविन्द जैन

    395.00
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    बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री – अरविन्द जैन

    बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री
    अरविन्द जैन

    स्त्री-जीवन के क़ानूनी पहलू पर विस्तार और प्रामाणिक जानकारी से लिखते हुए अरविन्द जैन ने स्त्री-विमर्श की सामाजिक-साहित्यिक सैद्धान्तिकी में एक ज़रूरी पहलू जोड़ा। क़ानून की तकनीकी पेचीदगियों को खोलते हुए उन्होंने अक्सर उन छिद्रों पर रोशनी डाली जहाँ न्याय के आश्वासन के खोल में दरअसल अन्याय की चालाक भंगिमाएँ छिपी होती थीं। इसी के चलते उनकी किताब ‘औरत होने की सज़ा’ को आज एक क्लासिक का दर्जा मिल चुका है। स्त्री लगातार उनकी चिन्ता के केन्द्र में रही है। बतौर वकील भी, बतौर लेखक भी और बतौर मनुष्य भी। सम्पत्ति के उत्तराधिकार में औरत की हिस्सेदारी का मसला हो या यौन शोषण से सम्बन्धित क़ानूनों और अदालती मामलों का, हर मुद्दे पर वे अपनी किताबों और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठक का मार्गदर्शन करते रहे हैं। ‘बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री’ उनकी नई किताब है जो काफ़ी समय के बाद आ रही है। इस दौरान भारतीय स्त्री ने अपनी एक नई छवि गढ़ी है, और एक ऐसे भविष्य का नक़्शा पुरुष-समाज के सामने साफ़ किया है जिसे साकार होते देखने के लिए शायद अभी भी पुरुष मानसिकता तैयार नहीं है। लेकिन जिस गति, दृढ़ता और निष्ठा के साथ बीसवीं सदी के आख़िरी दशक और इक्कीसवीं के शुरुआती वर्षों में पैदा हुई और अब जवान हो चुकी स्त्री अपनी राह पर बढ़ रही है, वह बताता है कि यह सदी स्त्री की होने जा रही है और सभ्यता का आनेवाला समय स्त्री-समय होगा। इस किताब का आधार-बोध यही संकल्पना है। तार्किक, तथ्य-सम्मत और सद्भावना से बुना हुआ स्त्री के भविष्य का स्वप्न। उनका विश्वास है कि अब साल दर साल देश के तमाम सत्ता-संस्थानों में शिक्षित, आत्मनिर्भर, साधन-सम्पन्न, शहरी स्त्रियों की भूमिका और भागीदारी अप्रत्याशित रूप से बढ़ेगी। समान अधिकारों के लिए सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष तेज़ होंगे और भविष्य की स्त्री हर क्षेत्र में हाशिये के बजाय केन्द्र में दिखाई देने लगेगी। समानता और न्याय की तलाश में निकली स्त्री अपना सबकुछ दाँव पर लगा रही है। सो भविष्य की स्त्री इन्साफ माँगेगी। सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक इन्साफ़। देह और धरती पर ही नहीं सबकुछ पर बराबर अधिकार।

    पृष्ठ-158 रु395

    395.00
  • कॉपीराइट – कमलेश

    75.00
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    कॉपीराइट – कमलेश

    कॉपीराइट
    कमलेश

    कॉपीराइट यानी प्रतिलिपि अधिकार का जन्म मौलिक सृजन और उसके व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिए हुआ था। लेकिन कॉपीराइट के मामले छापाख़ाने के आविष्कार के बाद उठना शुरू हुए। इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय ने पुस्तकों की नक़ल पर रोक लगाने के लिए 1662 में लाइसेंसिंग एक्ट पास किया। लेकिन पहला कॉपीराइट क़ानून 1709 में पास किए गए क़ानून को ही माना जाता है।

    कॉपीराइट पुस्तकों का ही नहीं संगीत, गीत, फ़िल्म, फ़ोटोग्राफ़ी, कला, वास्तुकला से लेकर सॉफ़्टवेयर तक हर क्षेत्र में सम्भव है और यह केवल एक देश का मसला नहीं है। 1886 में बर्न सम्मेलन में इसके अन्तरराष्ट्रीय रूप का निर्धारण हुआ। 1995 में विश्व व्यापार संगठन बनने के बाद से इसका और विस्तार हो रहा है।

    प्रस्तुत पुस्तक में भारतीय प्रतिलिपि अधिकार अधिनियम—1957 एवं प्रतिलिपि अधिकार नियमावली—1958 दोनों के उल्लेख हैं। इस अधिनियम की सम्पूर्ण जानकारी होने से रचनाकार यानी कलाकार, संगीतकार, लेखक आदि अपनी बौद्धिक सम्पदा की रक्षा कर सकते हैं। इस अर्थ में इस पुस्तक को सम्पूर्ण मार्गदर्शिका कहा जा सकता है जो लेखक, रचनाकार और प्रकाशक, सभी के लिए उपयोगी साबित होगी।

    पृष्ठ-144 रु75

    75.00
  • वैवाहिक विवाद : क़ानून, सलाहकारिता और समाधान – ममता सहगल

    400.00
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    वैवाहिक विवाद : क़ानून, सलाहकारिता और समाधान – ममता सहगल

    वैवाहिक विवाद : क़ानून, सलाहकारिता और समाधान
    ममता सहगल

    ‘वैवाहिक विवाद : क़ानून, सलाहकारिता और समाधान’ पुस्तक अत्यन्त संवेदनशील विषय को केन्द्र में रखकर लिखे गए लेखों का संग्रह है। आज के तनावपूर्ण समय में वैवाहिक विवादों और उनसे उत्पन्न विभिन्न पारिवारिक समस्याओं की संख्या बढ़ती जा रही है। इसका समाधान तलाशने के क्रम में सलाहकारिता को विधि का भी अन्त बना लिया गया है।

    ‘दो शब्द’ में पुस्तक की अनुवादक निर्मला शेरजंग लिखती हैं, ‘हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा सलाह केन्द्रों का स्थापन करना और दिल्ली क़ानूनी सहायता व सलाह बोर्ड की अध्यक्षता करना इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। सलाहकारिता एक मनोवैज्ञानिक रीति है और विवादों को सुलझाने व निपटाने में लाभदायक सिद्ध होती है।’

    पुस्तक में मनोवैज्ञानिकों, मनोविश्लेषकों, मनोचिकित्सकों, डॉक्टरों, भारतीय दर्शन के विशेषज्ञों व अनुभवी सलाहकारों के लेख हैं। मूलतः अंग्रेज़ी में लिखे इन लेखों का अनुवाद निर्मला शेरजंग ने किया है। अनुभवी व भाषामर्मज्ञ अनुवादक ने हिन्दी की प्रस्तुति को ध्यान में रखकर सामग्री को प्रस्तुत किया है। विश्वास है कि इस पुस्तक से एक ज्वलन्त समस्या को समझने व सुलझाने की मानसिकता प्रशस्त हो सकेगी।

    पृष्ठ-215 रु400

    400.00
  • GST : क्या, किसके लिए, कैसे – सुजय प्रकाश उपाध्याय

    150.00
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    GST : क्या, किसके लिए, कैसे – सुजय प्रकाश उपाध्याय

    GST : क्या, किसके लिए, कैसे
    सुजय प्रकाश उपाध्याय

    “इस पुस्तक में माल एवं सेवा कर प्रणाली के सभी महत्त्वपूर्ण विषयों; जैसे—रजिस्ट्रेशन, रिटर्न, पेमेंट, ऑडिट, कर-निर्धारण कम्पोजीशन स्कीम, टीडीएस ई-कॉमर्स, ट्रांजिशनल प्रावधान, ई-वे बिल, मुनाफ़ाखोरी-रोधी नियम, आपूर्ति-स्थल नियम, इनपुट टैक्स-क्रेडिट, टैक्स-इनवॉइस आदि पर न केवल महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई गई है बल्कि आवश्यकतानुसार प्रासंगिक उदाहरण देकर उसे सरलता से समझाया भी गया है। बेशक यह पुस्तक, उन सभी के लिए जो GST की विशिष्टताओं से अवगत होना चाहते हैं, एक गाइड और एक अनोखा वरदान है!”

    —कृष्ण स्वरूप वत्स

    पृष्ठ 179 रु150

    150.00