यशपाल द्वारा पुस्तकें

Books by Yashpal

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  • देशद्रोही - यशपाल

    देशद्रोही – यशपाल

    195.00
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    देशद्रोही – यशपाल

    देशद्रोही

    यशपाल

    हमारे वर्तमान जीवन का यथार्थ क्या है? क्या ऐसे समय में भी मिथ्या-विश्वास और प्रवंचना की पिनक में सन्तुष्ट रह सकना सम्भव है? सौन्दर्य और तृप्ति की अभिलाषा उत्पन्न कर देना एक काम है। सौन्दर्य और तृप्ति की स्मृति जगा कर सुख की अनुभूति उत्पन्न कर देना भी काम है, परन्तु उससे बढ़कर काम हो सकता है, सौन्दर्य और तृप्ति के साधनों की उत्पादन और परिस्थिति के निर्माण के लिए भावना और संकेत द्वारा सहयोग देना।

    साहित्य का कलाकार केवल चारण बनकर सौन्दर्य, पौरुष और तृप्ति की महिमा गाकर ही अपने सामाजिक कर्त्तव्य को पूरा नहीं कर सकता। विकास और पूर्णता के सामाजिक प्रयत्न की इच्छा और उत्साह उत्पन्न करना और उस उत्साह को विवेक और विश्लेषण की प्रवृत्ति द्वारा सजग और सचेत रखने की भावना जगाना, साहित्य के कलाकार का काम है।

    पृष्ठ-216 रु195

    195.00
  • गीता - यशपाल

    गीता – यशपाल

    90.00
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    गीता – यशपाल

    गीता

    यशपाल

    ‘गीता’ शीर्षक यह उपन्यास पहले ‘पार्टी कामरेड’ नाम से प्रकाशित हुआ था। इसके केन्द्र में गीता नामक एक कम्युनिस्ट युवती है जो पार्टी के प्रचार के लिए उसका अख़बार बम्बई की सड़कों पर बेचती है और पार्टी के लिए फंड इकट्ठा करती है। पार्टी के प्रति समर्पित निष्ठावान गीता पार्टी के काम के सिलसिले में अनेक लोगों के सम्पर्क में आती है। इन्हीं में से एक पदमलाल भावरिया भी है जो पैसे के बल पर युवतियों को फँसाता है। उसके साथी एक दिन उसे अख़बार बेचती गीता को दिखाकर फँसाने की चुनौती देते हैं। गीता और भावरिया का लम्बा सम्पर्क अन्ततः भावरिया को ही बदल देता है।

    अपने अन्य उपन्यासों की तरह इस उपन्यास में भी यशपाल देश की राजनीति और उसके नेताओं के चारित्रिक अन्तर्विरोधों को व्यंग्यात्मक शैली में उद्घाटित करते हैं। उपन्यास में कम्यून जीवन का बड़ा विश्वसनीय अंकन हुआ है जिसके कारण इस उपन्यास का ऐतिहासिक महत्त्व है। इसके लिए काफ़ी समय तक यशपाल मुम्बई में स्वयं कम्यून में रहे थे। अपने ऊपर लगाए गए प्रचार के आरोप का उत्तर देते हुए यशपाल उपन्यास की भूमिका में संकेत करते हैं कि वास्तविकता को दर्पण दिखाना भी प्रचार के अन्तर्गत आ सकता है या नहीं, यह विचारणीय है।

    पृष्ठ-99 रु90

    90.00
  • बारह घंटे - यशपाल

    बारह घंटे – यशपाल

    90.00
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    बारह घंटे – यशपाल

    बारह घंटे

    यशपाल

    ‘बारह घंटे’ यशपाल का अपने पाठकों के लिए एक वैचारिक आमंत्रण है। ईसाई समाज की पृष्ठभूमि में घटित इस उपन्यास के केन्द्र में विधवा विनी और विधुर फेंटम हैं जो कुछ विशेष परिस्थितियों में परस्पर भावनात्मक बन्धन में बँध जाते हैं।

    उपन्यास की नायिका विनी की ओर से इस वृत्तान्त को ‘पाठकों के सम्मुख एक अपील के रूप में’ रखते हुए यशपाल इस उपन्यास के माध्यम से अनुरोध करते हैं कि ‘विनी को प्रेम अथवा दाम्पत्य निष्ठा निबाह न सकने का कलंक देने का निर्णय करते समय, विनी के व्यवहार को केवल परम्परागत धारणाओं और संस्कारों से ही न देखें। उसके व्यवहार को नर–नारी के व्यक्तिगत जीवन की आवश्यकता और पूर्ति की समस्या के रूप में तर्क तथा अनुभूति के दृष्टिकोण से, मानव में व्याप्त प्रेम की प्राकृतिक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में भी देखें।’

    वे पूछते हैं कि क्या नर–नारी के परस्पर आकर्षण अथवा दाम्पत्य सम्बन्ध को केवल सामाजिक कर्तव्य के रूप में ही देखना अनिवार्य है? आर्यसमाजी वर्जनाओं और दृष्टि की तर्कपूर्ण आलोचना करनेवाला यशपाल का एक विचारोत्तेजक उपन्यास।

    पृष्ठ-112 रु90

    90.00
  • क्यों फँसे - यशपाल

    क्यों फँसे – यशपाल

    90.00
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    क्यों फँसे – यशपाल

    क्यों फँसे

    यशपाल

    वैचारिक निष्ठा के आधार पर समाज और सम्बन्धों का विश्लेषण अक्सर ही यशपाल के उपन्यासों का विषय रहा है। लेखक के रूप में उनकी मान्यता थी कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन और प्रचलित मूल्यों का पिष्टपोषण नहीं, बल्कि उनके ऊपर प्रश्न उठाना और परिवर्तन को बल प्रदान करना है।

    ‘क्यों फँसें’ उपन्यास स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की जटिल दुनिया का अन्वेषण है। अट्ठाईस वर्षीय युवा पत्रकार और मोती के रति-सम्बन्धों को आधार बनाकर लिखा गया यह वृत्तान्त स्त्री और पुरुष के रिश्तों में एक नई दिशा को खोजने की कोशिश करता है, और हमारे सामने विचार के लिए कई प्रश्न छोड़ जाता है।

    पृष्ठ-120 रु90

    90.00
  • उत्तमी की माँ - यशपाल

    उत्तमी की माँ – यशपाल

    75.00
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    उत्तमी की माँ – यशपाल

    उत्तमी की माँ

    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी
    है।

    ‘उत्तमी की माँ’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘उत्तमी की माँ’, ‘नमक हराम’, ‘पतिव्रता’, ‘आत्म-अभियोग’, ‘करुणा’, ‘भगवान् के पिता के दर्शन’, ‘न कहने की बात’, ‘भगवान का खेल’, ‘करवा का व्रत’, ‘नक़ली माल’ और ‘पाप का कीचड़’।

    पृष्ठ-128 रु75

    75.00
  • दादा कामरेड - यशपाल

    दादा कामरेड – यशपाल

    95.00
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    दादा कामरेड – यशपाल

    दादा कामरेड

    यशपाल

    ‘दादा कामरेड’…यह उपन्यास लेखक की पहली रचना थी जिसने हिन्दी में रोमांस और राजनीति के मिश्रण का आरम्भ किया। यह उपन्यास बांग्ला उपन्यास सम्राट शरत् बाबू के प्रमुख राजनैतिक उपन्यास ‘पथेरदावी’ द्वारा क्रान्तिकारियों के जीवन और आदर्श के सम्बन्ध में उत्पन्न हुई भ्रामक धारणाओं का निराकरण करने के लिए लिखा गया था, परन्तु इतना ही नहीं यह श्री जैनेन्द्र की आदर्श नारी पुरुष की खिलौना ‘सुनीता’ का भी उत्तर है।

    यशपाल के इस उपन्यास से चुटिया कर रूढ़िवाद के अन्ध अनुयायियों ने लेखक को क़त्ल की धमकी दी थी, परन्तु देश की प्रगतिशील जनता की रुचि के कारण ‘दादा कामरेड’ के न केवल हिन्दी में कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं बल्कि गुजराती, मराठी, सिन्धी और मलयालम में भी यह उपन्यास अनुवादित हो चुका है।

    पृष्ठ-147 रु95

    95.00
  • गाँधीवाद की शव परीक्षा - यशपाल

    गाँधीवाद की शव परीक्षा – यशपाल

    110.00
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    गाँधीवाद की शव परीक्षा – यशपाल

    गाँधीवाद की शव परीक्षा

    यशपाल

    गांधी जी ने इस देश के सार्वजनिक जीवन में राजनैतिक नेता के रूप में प्रवेश किया था। गांधी जी ने देश की राजनैतिक मुक्ति के लिए जनता के सामने जो राजनैतिक कार्यक्रम रखा था, उसे गांधीदर्शन और गांधीवाद का नाम दिया गया था। गांधीवादी नीति पर चलने का दावा करनेवाली शासन व्यवस्था देश के सर्व-साधारण के जीवन से कठिनाई को दूर करने के लिए क्या कर सकी है, यह देश की जनता अपने अनुभव से जानती है। सर्वोदय को ध्येय माननेवाले दरिद्रनारायण के पुजारी गांधीवाद की इस विफलता का कारण समझने के लिए उनके सिद्धान्तों की परख आवश्यक है। जनता के लिए यह समझना आवश्यक है कि उनकी भौतिक समस्याओं और कठिनाइयों का उपाय, गांधीवाद अध्यात्म द्वारा सम्भव है या आर्थिक और राजनैतिक प्रयत्नों द्वारा? इस विचार के प्रयोजनों से ‘गांधीवाद की शव परीक्षा’ का यह संस्करण प्रस्तुत है।

    पृष्ठ-129 रु110

    110.00
  • यशपाल का कहानी संसार : एक अंतरंग परिचय - सी. एम. योहन्नान

    यशपाल का कहानी संसार : एक अंतरंग परिचय – सी. एम. योहन्नान

    160.00
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    यशपाल का कहानी संसार : एक अंतरंग परिचय – सी. एम. योहन्नान

    यशपाल का कहानी संसार : एक अंतरंग परिचय

    सीएमयोहन्नान

    यह सर्वविदित है कि यशपाल प्रेमचन्दोत्तर कथाकारों में श्रेष्ठतम हैं। भारतीय जीवन के आदर्शवादी विचारों और व्यवहार में जो झूठ की दीवारें खड़ी थीं, उन्हें गिराने में यशपाल ने अपनी क़लम का इस्तेमाल किया। जीवन का कोई भी क्षेत्र उनके प्रहारों से बच न सका।

    यशपाल कालजयी लेखक हैं। कथाकार की हैसियत से यशपाल की लोकप्रियता हिन्दी-जगत में जितनी व्यापक है, हिन्दीतर-जगत में उससे थोड़ी भी कम नहीं है। इसका कारण यह है कि कथाकार यशपाल ने शोषित वर्ग के जीवन का यथार्थपरक चित्र अंकित किया है।

    पृष्ठ-168 रु160

    160.00
  • अभिशप्त - यशपाल

    अभिशप्त – यशपाल

    75.00
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    अभिशप्त – यशपाल

    अभिशप्त

    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज्‍़यादा तरल रूप में, ज्‍़यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आती है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है। ‘अभिशप्त’ कहानी संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं—‘दास धर्म’, ‘अभिशप्त’, ‘काला आदमी’, ‘समाधि की धूल’, ‘रोटी का मोल’, ‘छलिया नारी’, ‘चार आने’, ‘चूक गयी’, ‘आदमी का बच्चा’, ‘पुलिस की दफा’, ‘रिजक’, ‘भगवान किसके?’, ‘नमक हलाल’, ‘पुनिया की होली’, ‘हवाखोर’ और ‘शम्बूक’।

    पृष्ठ-142 रु75

    75.00
  • प्रतिनिधि कहानियाँ : यशपाल – यशपाल

    75.00
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    प्रतिनिधि कहानियाँ : यशपाल – यशपाल

    प्रतिनिधि कहानियाँ : यशपाल
    यशपाल

    प्रेमचन्द की कथा-परम्परा को विकसित करनेवाले सुविख्यात कथाकार यशपाल के लिए साहित्य एक ऐसा शास्त्र था, जिससे उन्हें संस्कृति का पूरा युद्ध जितना था। और उन्होंने जीता। प्रत्येक स्तर पर वे सजग थे। विचार, तर्क, व्यंग्य, कलात्मक सौन्दर्य, मर्म-ग्राह्यता—हर स्तर पर उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रमाण दिया। समाज में जहाँ कहीं भी शोषण और उत्पीड़न था, जहाँ कहीं भी रूढ़ियों, परम्पराओं, नैतिकताओं, धर्म और संस्कारों की जकड़ में जीवन कसमसा रहा था, यशपाल की दृष्टि वहीं पड़ी और उन्होंने पूरी शक्ति से वहीं प्रहार किया। इसी दृष्टि को लेकर उन्होंने उस इतिहास-क्षेत्र में प्रवेश किया जहाँ के भीषण अनुभवों को भव्य और दिव्य कहा गया था। उन्होंने उस मानव-विरोधी इतिहास की धज्जियाँ उड़ा दीं। व्यंग्य उनकी रचना में तलवार की तरह रहा है और वे रहे हैं नए समाज की पुनर्रचना के लिए समर्पित एक योद्धा। मर्मभेदी दृष्टि, प्रौढ़ विचार और क्रन्तिकारी दर्शन ने उन्हें विश्व के महानतम रचनाकारों की श्रेणी में ला बिठाया है। ये कहानियाँ उनकी इसी तेजोमय यात्रा का प्रमाण जुटाती हैं।

    पृष्ठ-146 रु75

    75.00
  • ज्ञानदान – यशपाल

    95.00
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    ज्ञानदान – यशपाल

    ज्ञानदान
    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है। ‘ज्ञानदान’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘ज्ञानदानֺ’, ‘एक राज़’, ‘गण्डेरी’, ‘कुछ समझ न सका’, ‘दु:ख का अधिकार’, ‘पराया सुख’, ‘80/100’, या ‘सांई सच्चे!’, ‘ज़बरदस्ती’, ‘हलाल का टुकड़ा’, ‘मनुष्य’, ‘बदनाम’ और ‘अपनी चीज़’।

    पृष्ठ-147 रु95

    95.00
  • खच्चर और आदमी – यशपाल

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    खच्चर और आदमी – यशपाल

    खच्चर और आदमी
    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन: किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्‍टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्‍त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्‍त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर ख़रा जीवन—ये कुछ मूल्‍य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।

    ‘खच्चर और आदमी’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘वैष्‍णवी’, ‘मक्खी या मकड़ी’, ‘उपदेश’, ‘कलाकार की आत्‍महत्‍या आदमी या पैसा?’ ‘जीव दया’, ‘चोरी और चोरी’, ‘अश्लील!’, ‘सत्य का द्वन्द्व तथा खच्चर और आदमी’।

    पृष्ठ-113 रु75

    75.00
  • चित्र का शीर्षक – यशपाल

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    चित्र का शीर्षक – यशपाल

    चित्र का शीर्षक
    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।

    ‘चित्रा का शीर्षक’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘चित्रा का शीर्षक’, ‘हाय राम!…ये बच्चे!!’, ‘आदमी या पैसा?’, ‘प्रधानमंत्री से भेंट’, ‘मार का मोल’, ‘शहंशाह का न्याय’, ‘स्थायी नशा’, ‘एक सिगरेट’, ‘फूल की चोरी’, ‘अनुभव की पुस्तक’, ‘पाँव तले की डाल’, ‘साहू और चोर’ तथा ‘इसी सुराज के लिए’?

    पृष्ठ-118 रु75

    75.00
  • लैम्प शेड – यशपाल

    125.00
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    लैम्प शेड – यशपाल

    लैम्प शेड
    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता, और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्‍त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।

    ‘लैम्पशेड’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘नैतिक बल’, ‘सच्ची पूजा’, ‘कौन जाने?’, ‘बिना रोमांस’, ‘…अपना-अपना’, ‘एतकाद है’ और ‘लैम्‍पशेड’।

    पृष्ठ-56 रु125

    125.00
  • ओ भैरवी – यशपाल

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    ओ भैरवी – यशपाल

    ओ भैरवी
    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।

    ‘ओ भैरवी!’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘ओ भैरवी!’, ‘वर्दी’, ‘नकारा’, ‘सामन्ती कृपा’, ‘देवी की लीला’, ‘गौ माता’, ‘महाराजा का इलाज’, ‘मूर्ख क्रोध’, ‘सब की इज़्ज़त’, ‘न्याय और दंड’, ‘मन की पुकार’ और ‘देखा-सुना आदमी’।

    पृष्ठ-130 रु75

    75.00
  • फूलो का कुर्ता – यशपाल

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    फूलो का कुर्ता – यशपाल

    फूलो का कुर्ता
    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।

    ‘फूलो का कुर्ता’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘आतिथ्य’, ‘भवानी माता की जय’, ‘शिव-पार्वती’, ‘ख़ुदा की मदद’, ‘प्रतिष्ठा का बोझ’, ‘डरपोक कश्मीरी’, ‘धर्मरक्षा और ज़िम्मेवारी’।

    पृष्ठ-127 रु75

    75.00
  • उत्ताराधिकारी – यशपाल

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    उत्ताराधिकारी – यशपाल

    उत्ताराधिकारी
    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी
    है।

    ‘उत्तराधिकारी’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं: ‘उत्तराधिकारी’, ‘ज़ाब्ते की कार्रवाई’, ‘अगर हो जाता?’, ‘अंग्रेज़ का घुँघरू’, ‘अमर’, ‘चन्दन महाशय’, ‘कुल-मर्यादा’, ‘डिप्टी साहब’ और ‘जीत की हार’।

    पृष्ठ-123 रु95

    95.00
  • वो दुनिया – यशपाल

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    वो दुनिया – यशपाल

    वो दुनिया
    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी
    है।

    ‘वो दुनिया!’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘संन्यासी’, ‘दो मुँह की बात’, ‘बड़े दिन का उपहार’, ‘दूसरी नाक’, ‘मोटरवाली-कोयलेवाली’, ‘तूफान का दैत्य’, ‘कुत्ते की पूँछ’, ‘शिकायत’; ‘गुडबाई’, ‘दर्दे-दिल!’, ‘जहाँ हसद नहीं’, ‘नई दुनिया और वो दुनिया’।

    पृष्ठ-128 रु75

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  • पिंजरे की उड़ान – यशपाल

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    पिंजरे की उड़ान – यशपाल

    पिंजरे की उड़ान
    यशपाल

    यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी
    है।

    ‘पिंजरे की उड़ान’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘मक्रील’, ‘नीरस रसिक’, ‘हिंसा’, ‘समाज सेवा’, ‘प्रेम का सार’, ‘पहाड़ की स्मृति’, ‘पीर का मज़ार’, ‘दुखी-दुखी’, ‘भावुक’, ‘मृत्युंजय’, ‘शर्त?’, ‘तीसरी चिता’, ‘प्रायश्चित्त’, ‘हृदय’, ‘परायी’, ‘मज़हब’, ‘कर्मफल’, ‘दर्पण’, ‘परलोक और दु:ख’।

    पृष्ठ-162 रु95

    95.00