सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा पुस्तकें

Books by Suryakant Tripathi ‘Nirala’

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  • चोटी की पकड़ - सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    चोटी की पकड़ – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    150.00
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    चोटी की पकड़ – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    चोटी की पकड़

    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    हिन्दी कथा-साहित्य की यथार्थवादी परम्परा में निराला की कथाकृतियों का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनकी प्रायः हर कथाकृति का परिवेश सामाजिक यथार्थ से अनुप्राणित है। यही कारण है कि उनके कतिपय ऐतिहासिक पात्रों को भी हम एक सुस्पष्ट सामाजिक भूमिका में देखते हैं।

    ‘चोटी की पकड़’ यद्यपि ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है, लेकिन इतिहास के खँडहर इसमें पूरी तरह मौजूद हैं। इन्हीं खँडहरों के बीच नया इतिहास लिखा जा रहा है। बदलते समाज में टूटने और जुड़ने की प्रक्रिया चल रही है। स्वाधीनता की देवी जनता के हाथों अभिषिक्त होने जा रही है। स्वदेशी आन्दोलन की अनुगूँजें हर ओर सुनाई पड़ रही हैं, जिससे कुछ राजा और सामन्त भी उसका समर्थन करने को विवश हैं। लेकिन इस कथा-परिवेश में जितने भी चरित्र हैं, उनमें एक मुन्ना बाँदी भी है। अविस्मरणीय चरित्र है यह, जिसे निराला ने गहरी सहानुभूति से गढ़ा है।

    पृष्ठ-160 रु150

    150.00
  • भक्त प्रह्लाद - सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    भक्त प्रह्लाद – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    95.00
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    भक्त प्रह्लाद – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    भक्त प्रह्लाद

    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    भारत के पौराणिक साहित्य में अनेक ऐसे किशोर चरित्र हैं जो मनुष्य के अडिग विश्वास, आस्था और संकल्प बल के प्रतीक हैं। ‘भक्त प्रह्लाद’ हमारे पौराणिक आख्यानों का ऐसा ही चरित्र है। इस चरित्र की कथा के माध्यम से निराला ने प्रह्लाद के उस अटूट विश्वास को उजागर किया है जो किसी भी आततायी के सामने पराजित नहीं होता। साथ ही, मानव-प्रकृति के वर्णन पर भी निराला ने अपना ध्यान केन्द्रित किया है। भक्त प्रह्लाद जब शिक्षा के लिए गुरुकुल में पहुँचा तो गुरु ने आरम्भ में जो तीन बातें बतलाईं, उनमें तीसरी थी, “तुम यहाँ कभी यह घमंड न कर सकोगे कि तुम राजा के लड़के हो। यहाँ जितने लड़के हैं, सबका बराबर आसन है। सम्मान की दृष्टि से बड़ा वह है जिसने अध्ययन अधिक किया है। तुम्हें सदा ही उसका अदब करना चाहिए।” इसके बाद निराला लिखते हैं, “प्रह्लाद मौन धारण किए इन अनुशासनों को सुन रहे थे। तीसरी आज्ञा उन्हें भायी। राजा और रंक एक ही आसन पर बैठकर ज्ञानार्जन करते हैं, समता के इस भाव से समदर्शी बालक का मुख प्रफुल्ल हो उठा।”

    उपरोक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि ‘भक्त प्रह्लाद’ एक पौराणिक चरित्र का पुनराख्यान-मात्र नहीं है, बल्कि उसके माध्यम से निराला ने किशोर पीढ़ी के लिए समता और मनुष्यता का सन्देश भी दिया है।

    पृष्ठ-96 रु95

    95.00
  • भीष्म पितामह - सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    भीष्म पितामह – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    95.00
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    भीष्म पितामह – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    भीष्म पितामह

    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    भारतीय पौराणिक इतिहास में भीष्म पितामह-जैसा चरित्र दूसरा नहीं। महान वीर, संकल्पशील और धर्मपरायण होते हुए भी उन्होंने जो जीवन जिया, एक गहरे अवसाद की छाया उस पर सदैव पड़ती रही। कुरुवंशी राजकुमारों के पारस्परिक कलह ने उन्हें आजीवन उद्विग्न रखा, लेकिन कोई भी दारुण स्थिति उन्हें कर्तव्य-पथ से कभी विचलित नहीं कर पाई। अपने विलक्षण जीवन के अनेक मोड़ों पर वे हमें आदर्शों के चरम शिखर पर दिखाई देते हैं।

    महाकवि निराला ने भीष्म पितामह के इसी महान चरित्र को इस पुस्तक में शब्दबद्ध किया है। उन्हीं के शब्दों में, “महावीर भीष्म के चरित्र से सब शिक्षाएँ एक साथ मिल जाती हैं। पिता के प्रति पुत्र की कैसी भक्ति होनी चाहिए, माता और विमाता के प्रति उसके क्या कर्तव्य हैं, मनुष्यता का आदर्श क्या हो, शास्त्र-अध्ययन, ब्रह्मचर्य और सरल भाव से जीवन के निर्वाह का फल क्या है, समर-क्षेत्र में क्षत्रिय का आदर्श क्या है, यथार्थ वीरता किसे कहते हैं—इस तरह से मनुष्य के मस्तिष्क में मनुष्यता से सम्बन्ध रखनेवाले जितने प्रश्न आ सकते हैं, उन सबका उत्तर भीष्म के जीवन से मिल जाता है।’’

    निश्चय ही यह एक ऐसी पुस्तक है, जो किशोर एवं प्रौढ़—दोनों ही तरह के पाठकों को पसन्द आएगी।

    पृष्ठ-86 रु95

    95.00
  • भक्त ध्रुव - सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    भक्त ध्रुव – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    75.00
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    भक्त ध्रुव – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    भक्त ध्रुव

    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    किशोर पाठकों के प्रति दायित्वबोध से भरकर महाकवि ‘निराला’ ने काफ़ी कुछ लिखा है। उनके मन में भारतीय पुराकथाओं के अनेक आदर्श चरित्र थे, जिनको वे किशोर पाठकों तक ले जाना चाहते थे। ‘भक्त ध्रुव’ उनकी एक ऐसी ही पुस्तक है।

    ‘भक्त ध्रुव’ एक पौराणिक आख्यान पर आधारित है, किन्तु निराला ने इसमें ध्रुव की चिन्ता को एक मानवीय अर्थ देने का प्रयास किया है—“गहन अरण्य में एक ओर चिन्ता में डूबा हुआ एक बालक मन–ही–मन अपने भविष्य की चिन्ता कर रहा है। वह मनुष्य है, मनुष्य का हक़ लेकर पैदा हुआ है, मनुष्य से मनुष्योचित व्यवहार की आशा रखता है—तिरस्कार, घृणा, अपमान, अत्याचार, निर्यातन इन पाशविक वृत्तियों के विरोध के लिए आज उसके ख़ून का हर एक बूँद तीव्र गति से उसे कार्य–तत्पर कर रहा है। बालक सोच रहा है इस अत्याचार का उपाय। चिरकाल से मनुष्य जाति, मनुष्य जाति पर जो अत्याचार करती चली आ रही है, इसका कारण और साथ ही इसका प्रतिरोध भी। वह अत्याचार सहने के लिए नहीं आया।”

    स्पष्ट है कि निराला ने एक पौराणिक आख्यान को नए अर्थ दिए हैं, उसे हमारी आज की चिन्ताओं से जोड़ा है। अत्यन्त प्रांजल भाषा में लिखी गई यह पुस्तक किशोर पाठकों के लिए न केवल रोचक बल्कि प्रेरणाप्रद भी सिद्ध होगी।

    पृष्ठ-79 रु75

    75.00
  • आधुनिक हिन्दी कविता - विश्वनाथप्रसाद तिवारी

    आधुनिक हिन्दी कविता – विश्वनाथप्रसाद तिवारी

    195.00
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    आधुनिक हिन्दी कविता – विश्वनाथप्रसाद तिवारी

    आधुनिक हिन्दी कविता

    विश्वनाथप्रसाद तिवारी

    प्रस्तुत पुस्तक में प्रसिद्ध कवि-आलोचक डॉ. विश्वनाथप्रसाद तिवारी ने आधुनिक हिन्दी कविता के तेरह प्रमुख कवियों—मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, हरिवंशराय बच्चन, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, नरेन्द्र शर्मा और स.ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की कविताओं का विश्लेषण-मूल्यांकन किया है। उपर्युक्त कवियों के काव्य का यह अध्ययन अपने संक्षिप्त रूप में विराट विस्तार को समेटने वाला है। बूँद में समुद्र की तरह। यह उन कवियों की मुख्य काव्य-विशेषताओं को उद्घाटित करता है, साथ ही एक लम्बी कालावधि की काव्य प्रवृत्तियों को भी। पुस्तक में किसी प्रकार का पूर्वग्रह नहीं है, न उखाड़-पछाड़ वाली दृष्टि। लेखक ने पूरी तरह सन्तुलित-तटस्थ दृष्टि से सहृदयता के साथ कवियों के काव्यानुभव और उनकी काव्यभाषा की समीक्षा की है। अवश्य ही यह पुस्तक पाठकों का ध्यान सही निष्कर्षों की ओर आकृष्ट करेगी।

    इस पुस्तक से हिन्दी कविता के कुछ अत्यन्त विशिष्ट कवियों के माध्यम से कविता के एक महत्वपूर्ण युग की उपलब्धियों के बारे में स्‍पष्ट जानकारी मिलेगी। इसमें सन्देह नहीं कि आकार में यह लघु पुस्तक साहित्य के अध्येताओं के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।

    पृष्ठ-148 रु195

    195.00
  • गीत गुंज - सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    गीत गुंज – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    200.00
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    गीत गुंज – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    गीत गुंज

    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    महाप्राण निराला के काव्य में गीतों का विशेष स्थान है। इस नाते ‘गीत-गुंज’ उनका एक प्रतिनिधि गीत-संग्रह है। इस संग्रह में अनेक ऐसे गीत हैं, जिन्हें निराला अकसर गुनगुनाते थे। वर्ण्य विषय की दृष्टि से ज़्यादातर गीत प्रकृतिपरक हैं, जिनमें प्रकृति के मात्र मोहक बिम्ब ही नहीं, उसका यथार्थ स्वरूप मुखरित हुआ है। स्पष्टत: इन गीतों के माध्यम से निराला एक नई चेतना प्रदान करना चाहते हैं। गीतों के अलावा मुक्त छन्द में लिखी गई कुछ कविताएँ और स्वामी विवेकानंद की दो कविताओं का अनुवाद भी इस संग्रह में शामिल है।.

    पृष्ठ-96 रु200

    200.00
  • प्रबंध प्रतिमा - सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    प्रबंध प्रतिमा – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    250.00
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    प्रबंध प्रतिमा – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    प्रबंध प्रतिमा

    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    निराला कवि होने के साथ-साथ विचारक भी थे, अपने देश-काल के प्रति सजग विचारक। यही कारण है कि उनका रचना-कर्म केवल कविता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने कहानी, उपन्यास, आलोचना, निबन्ध आदि भी लिखे और इन विधाओं में भी अपना विशिष्ट स्थान बनाया।

    ‘प्रबंध प्रतिमा’ निराला जी के लेखों का दूसरा संकलन है। इसमें अधिकांश विचार-प्रधान लेख हैं, कुछ संस्मरणात्मक भी हैं, जैसे : ‘गांधी जी से बातचीत’, ‘नेहरू जी से दो बातें’, ‘प्रान्तीय साहित्य सम्मेलन’। विचार-प्रधान लेखों में पाँच लेख सामाजिक समस्याओं पर हैं तथा ‘महर्षि दयानन्द सरस्वती और युगान्तर’ एवं ‘साहित्यिक सन्निपात या वर्तमान धर्म’ शीर्षक लेखों में निराला के धर्मविषयक चिन्तन को अभिव्यक्ति मिली है। बाक़ी सब लेख साहित्यिक विषयों पर हैं, लेकिन यहाँ भी उन्होंने एक तरफ़ विद्यापति और चंडीदास सरीखे प्राचीन कवियों पर विचार किया है, तो दूसरी तरफ़ अपने समकालीन साहित्यकारों तथा प्रवृत्तियों पर टिप्पणियाँ की हैं।

    संक्षेप में, ‘प्रबंध प्रतिमा’ साहित्यिक, सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों पर निराला के विचारोत्तेजक लेखों का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।

    पृष्ठ-208 रु250

    250.00
  • सम्पूर्ण कहानियाँ : सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला” – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    750.00
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    सम्पूर्ण कहानियाँ : सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला” – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    सम्पूर्ण कहानियाँ : सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला”
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    ‘सम्पूर्ण कहानियाँ’—प्रखर जनवादी चेतना के लेखक निराला की 25 कहानियों का महत्त्वपूर्ण संग्रह है। इन कहानियों को रचना-क्रम और प्रकाशन-क्रम से यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

    निराला ने अपनी इन कहानियों में विषयवस्तु के अनुरूप ही कहानी का नया रूप गढ़ा है। वे कई बार संस्मरणात्मक ढंग से अपनी बात करते हैं, लेकिन अन्त तक आते-आते मामूली-से बदलाव से संस्मरण को कहानी में बदल देते हैं।

    निराला के पहले चरण के उपन्यासों में जिस तरह कल्पना और यथार्थ के बीच अन्तर्विरोध दिखाई देता है, वह अन्तर्विरोध उपन्यास की अपेक्षा इन कहानियों में ज़्यादा तीखा है।

    इन कहानियों में उनका गद्य हास्य का पुट लिये नई दीप्ति के साथ सामने आया है। जितना उसमें कसाव है, पैनापन भी उतना ही।

    सुरुचिपूर्ण साज-सज्जा में प्रकाशित निराला की ये सम्पूर्ण कहानियाँ पाठकों को पहले की तरह ही अपनी ओर आकर्षित करेंगी।

    पृष्ठ-259 रु750

    750.00
  • सुकुल की बीवी – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    125.00
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    सुकुल की बीवी – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    सुकुल की बीवी
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    प्रस्तुत संग्रह में निराला की चार कहानियाँ संगृहीत हैं और चारों का रंग अलग-अलग है। ‘क्या देखा’ में अगर हीरा नामक महिला की व्यथा-कथा है, तो ‘कला की रूपरेखा’ में एक सत्य घटना के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि कला जीवन से निरपेक्ष नहीं हो सकती, पहचाननेवाली आँख हो तो जीवन में ही कला का अस्तित्व दिखाई देगा। ‘सुकुल की बीवी’ निराला के विद्रोही तेवर की कहानी है। एक मुसलमान पिता और हिन्दू माँ की सन्तान पुरखराज का विवाह सुकुल जी से कराने में निराला सहायक बनते हैं। उस समय के समाज में यह अकल्पनीय था। चौथी कहानी ‘श्रीमती गजानंद शास्त्रिणी’ में व्यंग्य का स्वर है। श्रीमती गजानंद शास्त्रिणी छायावाद के विरोध में उपदेशात्मक लेख लिखकर लोकप्रियता अर्जित करती हैं। उनकी सफलता अवसरवाद की सफलता है।

    कुल मिलाकर यह छोटा-सा संग्रह कहानी के क्षेत्र में निराला की विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है, और आशा है कि नए रूप-रंग में प्रकाशित यह संस्करण पाठकों को प्रीतिकर लगेगा।

    पृष्ठ-80 रु125

    125.00
  • चतुरी चमार – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    125.00
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  • आराधना – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    195.00
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    आराधना – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    आराधना
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    आराधना के गीत निराला-काव्य के तीसरे चरण में रचे गए हैं, मुख्यतया 24 फरवरी 1952 से आरम्‍भ करके दिसम्बर 1952 के अन्त तक। इन गीतों से यह भ्रम हो सकता है कि निराला पीछे की ओर लौट गए हैं। वास्तविकता यह है कि ”धर्म-भावना निराला में पहले भी थी, वह उनमें अन्‍त-अन्‍त तक बनी रही। उनके इस चरण के धार्मिक काव्य की विशेषता यह है कि वह हमें उद्विग्न करता है, आध्यात्मिक शान्ति निराला को कभी मिली भी नहीं, क्योंकि इस लोक से उन्होंने कभी मुँह नहीं मोड़ा, बल्कि इस लोक को अभाव और पीड़ा से मुक्त करने के लिए वे कभी सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलनों की ओर देखते रहे और कभी ईश्वर की ओर। उनकी यह व्याकुलता ही उनके काव्य की सबसे बड़ी शक्ति है।”

    —नंदकिशोर नवल

    पृष्ठ-108 रु195

    195.00
  • अनामिका – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    450.00
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    अनामिका – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    अनामिका
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    छायावाद के प्रवर्तकों में सूर्यकान्‍त त्रिपाठी ‘निराला’ का नाम प्रमुख है। ‘मैं’ शैली अपना कर निराला ने हिन्दी कविता को नई दिशा प्रदान की और छन्दों के बन्धन से मुक्त कर उन्होंने हिन्दी कविता के लिए नई ज़मीन तैयार की। ‘अनामिका’ में संकलित कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं। ‘अनामिका’ नाम से निराला की कविताओं का संग्रह दो बार प्रकाशित हुआ। पहली बार ‘मतवाला’ के सम्पादक बाबू महादेव प्रसाद ने निराला की चौबीस कविताओं का संग्रह ‘अनामिका’ नाम से प्रकाशित किया था। इसमें निराला की प्रारम्भिक कविताएँ संकलित थीं। 1937 में पुन: ‘अनामिका’ नाम से ही निराला की कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ। इसे निराला की श्रेष्ठ कविताओं का संग्रह माना जाता है। ‘अनामिका’ को छायावाद का ‘गौरव-ग्रन्थ’ होने का श्रेय प्राप्त है।

    पृष्ठ-140 रु450

    450.00
  • अणिमा – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    250.00
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    अणिमा – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    अणिमा
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    पंडित नन्ददुलारे वाजपयी ने लिखा है कि हिन्‍दी में सबसे कठिन विषय निराला का काव्य-विकास है। इसका कारण यह है कि उनकी संवेदना एक साथ अनेक स्तरों पर संचरण ही नहीं करती थी, प्रायः एक संवेदना दूसरी संवेदना से उलझी हुई भी होती थी। इसका सबसे बढ़िया उदहारण उनका ‘अणिमा’ नमक कविता-संग्रह है।

    इसमें छायावादी सौन्‍दर्य-स्वप्न को औदात्य प्रदान करनेवाला गीत ‘नुपुर के सुर मन्‍द रहे, जब न चरण स्वच्छन्‍द रहे’ जैसे आध्यात्मिक गीत हैं, तो ‘गहन है यह अन्‍धकरा’ जैसे राष्ट्रीय गीत भी। इसी तरह इसमें ‘स्नेह-निर्झर बह गया है’ जैसे वस्तुपरक गीत भी। कुछ कविताओं में निराला ने छायावादी सौन्‍दर्य-स्वप्न को एकदम मिटाकर नए कठोर यथार्थ को हमारे सामने रखा है, उदाहरणार्थ—’यह है बाज़ार’, ‘सड़क के किनारे दूकान है’, ‘चूँकि यहाँ दाना है’ आदि कविताएँ। ‘जलाशय के किनारे कुहरी थी’ प्रकृति का यथार्थ चित्रण करनेवाला एक ऐसा विलक्षण सानेट है, जो छन्‍द नहीं; लय के सहारे चलता है ।

    उपर्युक्त गीतों और कविताओं से अलग ‘अणिमा’ में कई कविताएँ ऐसी हैं जो वर्णात्मक हैं, यथा—’उद्बोधन’, ‘स्फटिक-शिला’ और ‘स्वामी प्रेमानन्‍द जी महाराज’, ये कविताएँ वस्‍तुपरक भी हैं और आत्मपरक भी। लेकिन इनकी असली विशेषता यह है कि इनमें निराला ने मुक्त-छन्‍द का प्रयोग किया है जिसमें छन्‍द और गद्य दोनों का आनन्‍ददायक उत्कर्ष देखने को मिलता है।

    आज का युग दलितोत्थान का युग है। निराला ने 1942 में ही ‘अणिमा’ के सानेट—’सन्‍त कवि रविदास जी के प्रति’—की अन्तिम पंक्तियों में कहा

    था : ‘छुआ परस भी नहीं तुमने, रहे/कर्म के अभ्यास में, अविरल बहे/ज्ञान-गंगा में, समुज्ज्वल चर्मकार, चरण छूकर कर रहा मैं नमस्कार’।

    —नंदकिशोर नवल

    पृष्ठ-95 रु250

    250.00
  • अपरा – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    300.00
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    अपरा – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    अपरा
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    ‘अपरा’ पहली बार सन् 1946 में प्रकाशित हुई थी, इसमें महाकवि निराला की उस समय तक प्रकाशित उनके सभी संग्रहों में से चुनी हुई कविताएँ संकलित हैं। चयन स्वयं निराला ने किया था, इसलिए इसकी महत्ता स्वतःसिद्ध है। यहाँ संकलित कविताओं से निराला के कवि-रूप का समग्र परिचय प्राप्त किया जा सकता है। इस अर्थ में यह संकलन ‘गागर में सागर’ ही है।

    पृष्ठ-183 रु300

    300.00
  • अन्त अनन्त – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    250.00
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    अन्त अनन्त – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    अन्त अनन्त
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    यह संकलन सम्‍पूर्ण निराला-काव्य का परिचय देने के लिए नहीं, बल्कि इस उद्देश्य से तैयार किया गया है कि इससे पाठकों को उसकी मनोहर तथा उदात्त झाँकी-भर प्राप्त हो, जिससे वे उसकी ओर आकृष्ट हों और आगे बढ़ें।

    निराला की ख़ासियत क्या है? वे प्रचंड रूमानी होते हुए भी क्लासिकी हैं, भावुक होते हुए भी बौद्धिक, क्रान्तिकारी होते हुए भी परम्परावादी तथा जहाँ सरल हैं, वहाँ भी एक हद तक कठिन। उनकी अपनी शैली है, अपनी काव्य-भाषा। अभिव्यक्ति की अपनी भंगिमाएँ और मुद्राएँ।

    यह सर्वथा स्वाभाविक है कि उनके निकट जानेवाले पाठकों से यह अपेक्षा की जाए कि उनका काव्यानुभव बच्चन, दिनकर या मैथिलीशरण गुप्त तक ही सीमित न हो। जब वे किंचित् प्रयासपूर्वक उक्त कवियों से हटकर उनके काव्य-लोक में प्रवेश करेंगे, तो पाएँगे कि उनकी तुलना में वे उनके ज्‍़यादा आत्मीय हैं।

    निराला के प्रसंग में सरलता का यह मतलब क़तई नहीं है कि उनकी कविताएँ पाठकों के मन में बेरोक-टोक उतर जाएँ। कारण यह है कि उनके लिए काव्य-राचन सशक्त भावनाओं का मात्र अनायास विस्फोट नहीं था, बल्कि वे अपनी प्रत्येक कविता को किंचित् आयासपूर्वक पूरी बौद्धिक सजगता के साथ गढ़ते थे। स्वभावतः उनकी सम्पूर्ण अभिव्यकि कलात्मक अवरोध से युक्त है, जिसे ग्रहण करने के लिए थोड़ा धैर्य और श्रम आवश्यक है।

    इस पुस्तक में निराला के काव्य-विकास की तीनों अवस्थाओं—पूर्ववर्ती, मध्यवर्ती और परवर्ती—की सौ चुनी हुई सरल कविताएँ संकलित की गई हैं, प्राय रचना-क्रम से। आरम्भिक दोनों अवस्थाओं में सृजन के कई-कई दौर रहे हैं, कविता और गीत के, जिसकी सूचना अनुक्रम से लेकर पुस्तक के भीतर सामग्री-संयोजन तक में दी गई है।

    पाठक मानेंगे कि यह कविता की एक नई दुनिया है, अधिक आत्मीय और प्रत्यक्ष, जिसे भाषा सजाती नहीं बल्कि अपनी भीतरी शक्ति से खड़ी करती है।

    पृष्ठ-148 रु250

    250.00
  • बेला – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    125.00
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    बेला – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    बेला
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    ‘बेला’ और ‘नए पत्ते’ के साथ निराला-काव्य का मध्यवर्ती चरण समाप्त होता है। ‘बेला’ उनका एक विशिष्ट संग्रह है, क्योंकि इसमें सर्वाधिक ताज़गी है। अफ़सोस कि निराला-काव्य के प्रेमियों ने भी इसे लक्ष्य नहीं किया, इसे उनकी एक गौण कृति मान लिया है। ‘नए पत्ते’ में छायावादी सौन्दर्य-लोक का सायास किया गया ध्वंस तो है ही, यथार्थवाद की अत्यन्त स्पष्ट चेतना भी है। ‘बेला’ की रचनाओं की अभिव्यक्तिगत विशेषता यह है कि वे समस्त पदावली में नहीं रची गईं, इसलिए ‘ठूँठ’ होने से बच गई हैं।

    इस संग्रह में बराबर-बराबर गीत और ग़ज़लें हैं। दोनों में भरपूर विषय-वैविध्य है, यथा—रहस्य, प्रेम, प्रकृति, दार्शनिकता, राष्ट्रीयता आदि। इसकी कुछ ही रचनाओं पर दृष्टिपात करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। ‘रूप की धारा के उस पार/कभी धँसने भी दोगे मुझे?’, ‘बातें चलीं सारी रात तुम्हारी; आँखें नहीं खुलीं तुम्हारी।’, ‘लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो/भरा दौंगरा उन्हीं पर गिरा।’ बाहर मैं कर दिया गया हूँ। भीतर, पर, भर दिया गया हूँ।’ आदि। राष्ट्रीयता ज़्यादातर उनकी ग़ज़लों में देखने को मिलती है।

    निराला की ग़ज़लें एक प्रयोग के तहत लिखी गई हैं। उर्दू शायरी की एक चीज़ उन्हें बहुत आकर्षित करती थी। वह भी उसमें पूरे वाक्यों का प्रयोग। उन्होंने हिन्दी में भी ग़ज़लें लिखकर उसे हिन्दी कविता में लाने का प्रयास किया। लेकिन निराला-प्रेमियों ने उसे एक नक़ल-भर मान उन्हें असफल ग़ज़लकार घोषित कर दिया। सच्चाई यह कि आज हिन्दी में जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, उनके पुरस्कर्ता भी निराला ही हैं। ये ग़ज़लें मुसलसल ग़ज़लें हैं। मैं स्थानाभाव में उनकी एक ग़ज़ल का एक शे’र ही उद्धृत कर रहा हूँ :

    तितलियाँ नाचती उड़ाती रंगों से मुग्ध कर-करके,

    प्रसूनों पर लचककर बैठती हैं, मन लुभाया है।

    पृष्ठ-111 रु125

    125.00
  • गीतिका – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    195.00
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    गीतिका – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    गीतिका
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    ‘गीतिका’ में संकलित अधिकांश गीतों का विषय प्रेम, यौवन और सौन्दर्य है, जिसकी अभिव्यक्ति के लिए निराला कहीं नारी को सम्बोधित करते हैं तो कहीं प्रकृति को, लेकिन आह्लाद की चरम अवस्था में नारी और प्रकृति का भेद ही मिट जाता है और तब नारी तथा प्रकृति एकमेक हो उठती हैं। कुछ गीत प्रार्थनापरक भी हैं, लेकिन स्वर इनका भी उल्लासपूर्ण ही है।

    महाकवि निराला के काव्य में गीतिका का विशिष्ट स्थान है। इसमें संकलित गीत एक ओर उत्कृष्ट कविता का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं, तो दूसरी ओर निराला के गहन संगीत-ज्ञान का। कविता और संगीत का ऐसा सामंजस्य हिन्दी कविता में दुर्लभ है।

    पृष्ठ-160 रु195

    195.00
  • कुकुरमुत्ता – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

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    कुकुरमुत्ता – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    कुकुरमुत्ता
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    अर्थ-समस्या में निरर्थकता को समूल नष्ट करना साहित्य और राजनीति का कार्य है। बाहरी लदाव हटाना ही चाहिए, क्योंकि हम जिस माध्यम से बाहर की बातें समझते हैं वह भ्रामक है, ऐसी हालत में ‘इतो नष्टस्ततो भ्रष्ट:’ होना पड़ता है। किसी से मैत्री हो, इसका अर्थ यह नहीं कि हम बेजड़ और बेजर हैं। अगर हमारा नहीं रहा तो न रहने का कारण है, कार्य इसी पर होना चाहिए। हम हिन्दी-संसार के कृतज्ञ हैं, जिसने अपनी आँख पाई हैं। इस पथ में अप्रचलित शब्द नहीं। बाज़ार आज भी गवाही देता है कि किताब चाव से ख़रीदी गई, आवृत्ति हज़ार कान सुनी गई और तारीफ़ लाख मुँह होती रही।

    इसका विषयवस्तु, शिल्प, भाषिक संरचना और अभिव्यक्ति की नई एकान्विति के कारण अद्‌भुत रूप से महत्त्वपूर्ण है। इन आठों कविताओं का मिज़ाज बिलकुल एक-सा है। उनकी ताज़गी, उनके शब्द-प्रयोग, उनकी गद्यात्मकता का कवित्व, भाषा का अजीब-सा छिदरा-छिदरा संघटन, अन्दर तक चीरता हुआ व्यंग्य और उन्मुक्त हास्य-क्षमता तथा कठोरता के कवच में छिपी अगाध (अप्रत्यक्ष) करुणा और उपेक्षित के उन्नयन के प्रति गहरी आस्था ‘निराला’ की रचना-सक्षमता और काव्य-दृष्टि के एक नए  (सर्वथा अछूते नहीं) आयाम को हमारे सामने उद्‌घाटित करती है।

    प्रस्तुत संग्रह ‘कुकुरमुत्ता’ की व्यंग्य और भाषा आधुनिक है।

    पृष्ठ-79 रु95

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  • राग’विराग – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

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    राग’विराग – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    राग’विराग
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    …यह उन कविताओं का संग्रह है जिनमें जितना आनन्द का अमृत है, उतना ही वेदना का विष। कवि चाहे अमृत दे, चाहे विष, इनके स्रोत इसी धरती में हों तो उसकी कविता अमर है।

    …जैसे ‘उड़ि जहाज को पंछी फिरि जहाज पर आवै’, निराला की कविता आकाश में चक्कर काटने के बाद इसी धरती पर लौट आती है।

    …निराला की कल्पना धरती के भीतर पैठकर वनबेला की सुगन्ध के साथ ऊपर उठती है।

    …इस धरती के सौन्दर्य से निराला का मन बहुत दृढ़ता से बँधा हुआ है। आकाश में उड़नेवाले रोमांटिक कवियों और धरती के कवि निराला में यही अन्तर है।

    …नारी के सौन्दर्य के बिना बसन्त का उल्लास अधूरा है। निराला की शृंगारी रचनाएँ देखकर विरोधी आलोचक कहते थे—ये कैसे छायावादी कवि हैं, जो अपने को ही रहस्यवादी कहते हैं और नारी सौन्दर्य के गीत भी गाते हैं।

    …निराला ने गतकर्म सरोज को अर्पित कर दिए, फिर नया कर्म आरम्भ किया, उन्होंने ‘राम की शक्ति-पूजा’ लिखी। ‘सरोज-स्मृति’ से निराला का आधा दु:ख सरोज की मृत्यु के कारण है, आधा उनके अपने संघर्षों के कारण।

    …वह दु:ख की कथा सरोज के जन्म से पहले शुरू हुई थी और सरोज की मृत्यु के बाद बहुत दिन तक चलती रही। उसी की एक कड़ी है ‘राम की शक्ति-पूजा’।

    …यह संग्रह निराला के सुदीर्घ कवि जीवन की सार्थकता का भी प्रमाण है।

    —रामविलास शर्मा (इसी संग्रह से)

    पृष्ठ-130 रु450

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  • परिमल – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

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    परिमल – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    परिमल
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    महाकवि ‘निराला’ की युगान्तरकारी कविताओं का अति विशिष्ट और सुविख्यात संग्रह है—‘परिमल’।

    इसी में है ‘तुम और मैं’, ‘तरंगों के प्रति’, ‘ध्वनि’, ‘विधवा’, ‘भिक्षुक’, ‘संध्या-सुन्दरी’, ‘जूही की कली’, ‘बादल-राग’, ‘जागो फिर एक बार’—जैसी श्रेष्ठ कविताएँ, जो समय के वृक्ष पर अपनी अमिट लकीर खींच चुकी हैं।

    ‘परिमल’ में छाया-युग और प्रगति-युग अपनी सीमाएँ भूलकर मानो परस्पर एकाकार हो गए हैं। इसमें दो-दो काव्य-युगों की गंगा-जमुनी छटा है, दो-दो भावधाराओं का सहजमुक्त विलास है।

    पृष्ठ-205 रु595

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  • नये पत्ते – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

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    नये पत्ते – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    नये पत्ते
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    निराला का दूसरे चरण का काव्य भी दो दौरों से गुज़रा है। उसके पहले दौर में ‘कुकुरमुत्ता’ (प्रथम संस्करण) और ‘अणिमा’ की कविताएँ रची गई हैं और उसके दूसरे दौर में ‘बेला’ और ‘नये पत्ते’ की कविताएँ। निराला के पहले चरण के तीसरे दौर की कविताओं में ही उनका यथार्थवादी रुझान प्रबलतर होता हुआ दिखलाई पड़ता है। उसी का विकास दूसरे चरण के पहले दौर की कविताओं में देखने को मिलता है। निराला बहुत ही संश्लिष्ट भाव-बोध के कवि थे, इसलिए वे इस दौर में भी गीत-रचना करते रहते हैं।

    ‘अणिमा’ की अनेक रचनाएँ इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं कि निराला का सामाजिक यथार्थ का ज्ञान प्रौढ़तर हुआ है। इससे उनका यथार्थवाद नये उत्कर्ष को प्राप्त करता है, जिसे हम ‘नये पत्ते’ की नई कविताओं में, जिनका सम्बन्ध किसानों से है, स्पष्टता से देखते हैं। यह निराला-काव्य की नई मंजिल है। इसी कारण हमने ‘बेला’, ‘नये पत्ते’ की कविताओं को उनके दूसरे चरण के काव्य के दूसरे दौर की कविताएँ माना है।

    निराला का यथार्थवाद ‘नये पत्ते’ की ‘कुत्ता भौंकने लगा’, ‘झींगुर डटकर बोला’, ‘छलाँग मारता चला गया’, ‘डिप्टी साहब आए’ और ‘महगू महगा रहा’ जैसी कविताओं में बुलन्दी पर पहुँचता है।

    —नन्दकिशोर नवल (निराला रचनावली की भूमिका से)।

    पृष्ठ-111 रु250

    250.00
  • दो शरण – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

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    दो शरण – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    दो शरण
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    निराला की सम्पूर्ण गीत-रचना का एक बहुत बड़ा भाग शरणागति या प्रपत्ति-भाव के गीतों से सम्बद्ध है। भक्ति, प्रार्थना और शरणागति के गीत ‘परिमल’ संग्रह से ही हमें मिलने लगते हैं। इसकी क्षीण ध्वनि उनके पहले संग्रह ‘अनामिका’ की ‘माया’ कविता में हमें सुनाई देती है। ‘या कि ले कर सिद्धि तू आगे खड़ी, त्यागियों के त्याग की आराधना’—कहकर कवि अपनी रचनात्मकता की उस विशेष दिशा की ओर संकेतित करता है, जो आगे चलकर उसके अवसाद, उसकी उदासी, खिन्नता, मृत्यु-भय और आत्म-जर्जरता से होती हुई, अन्ततः शरणागति की प्रार्थना-भूमि पर उसे उतारती है।

    ‘आराधना’ और ‘अर्चना’ में उसकी संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। अकेले ‘अर्चना’ में शरणागति के लगभग 34-35 गीत संगृहीत हैं। ‘गीत-गुंज’ और उनके अन्तिम संग्रह ‘सांध्य काकली’ में भी यह प्रार्थना-क्रम तिरोहित नहीं हुआ है। यद्यपि अपने जीवन के अन्तिम दिनों में निराला ‘प्रार्थना की व्यर्थता’ की बात भी करते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन यह उत्कट नैराश्य के क्षणों की ही अभिव्यक्ति लगती है, अन्यथा वे अपनी कारुणिक आत्म-जर्जरता में लगातार ‘प्रभु’ की अमर फ़ैंटेसी में शरण लेते हुए दिखाई देते हैं। उनके सारे संग्रहों को मिलाकर शरणागति और प्रार्थना-क्रम के इन गीतों की संख्या लगभग 90 के आस-पास पहुँचती है। इस तरह निराला के अन्तःसंगीत का एक बहुत महत्त्वपूर्ण भाग ‘प्रभु’ के इसी साक्षात्कार से सम्बद्ध है।

    वरिष्ठ लेखक दूधनाथ सिंह ने निराला की प्रपत्ति भाव की कविताओं को संकलित किया है। इन कविताओं में मनुष्य की उस आत्मिक मुक्ति की जद्दोजहद को सहज ही परिलक्षित किया जा सकता है, जो दरअसल सम्पूर्ण मानवमुक्ति का एक महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा है।

    पृष्ठ-151 रु295

    295.00
  • सांध्य काकली – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

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    सांध्य काकली – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    सांध्य काकली
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    निराला की ये अन्तिम कविताएँ अनेक दृष्टियों से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। उनके विचारों, आस्थाओं ही के सम्बन्ध में नहीं, उनके मानसिक असन्तुलन की उग्रता के सम्बन्ध में भी लोगों में बड़ा मतभेद है। उनकी इन अन्तिम कविताओं से इन विवादग्रस्त विषयों पर विचार करने में सहायता मिलेगी।

    निराला जी के असंख्य भक्तों, प्रशंसकों, उनकी कविता के अगणित प्रेमियों को यह जानने की उत्सुकता होगी कि उनकी अन्तिम कविताएँ कौन-सी हैं और कैसी हैं। यह ‘संग्रह’ उनके कुतूहल को भी शान्त कर सकेगा।

    पृष्ठ-91 रु95

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  • तुलसीदास “निराला” – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

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    तुलसीदास “निराला” – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    तुलसीदास “निराला”
    सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

    “तुलसीदास में स्वाधीनता की भावना का पूर्ण प्रस्फुटन हुआ है। भारत के सांस्कृतिक सूर्य के अस्त होने पर देश में किस तरह अन्धकार छाया हुआ है, इसका मार्मिक चित्रण करते हुए निराला ने दिखलाया है कि किस प्रकार एक कवि इस अन्धकार को दूर करने की चेष्टा करता है। तुलसीदास के रूप में निराला ने आधुनिक कवि के स्वाधीनता-सम्बन्धी भावों के उद्गम और विकास का चित्रण किया है। छायावादी कवि की तरह निराला के तुलसीदास को भी देश की पराधीनता का बोध प्रकृति की पाठशाला में ही होता है; किन्तु छायावादी कवि की तरह वे भी कुछ दिनों के लिए नारी-मोह में पड़कर उस भाव को भूल जाते हैं। अन्त में जो ज्ञान प्रकृति की पाठशाला में मिला था, उसका दीक्षांत भाषण उसी नारी के विश्वविद्यालय में सुनने को मिलता है, और भविष्यवाणी होती है कि :

    देश-काल के शर से बिंधकर

    यह जागा कवि अशेष छविधर

    इसके स्वर से भारती मुखर होंगी।

    इस तरह हिन्दी जाति के सबसे बड़े जातीय कवि की जीवन-कथा के द्वारा निराला ने अपनी समसामयिक परिस्थितियों में रास्ता निकालने का संकेत दिया है।”

    —नामवर सिंह

    पृष्ठ-72 रु150

    150.00