Narendra Dabholkar: Books

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  • आओ विवेकशील बनें - नरेंद्र दाभोलकर

    आओ विवेकशील बनें – नरेंद्र दाभोलकर

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  • भ्रम और निरसन - नरेंद्र दाभोलकर

    भ्रम और निरसन – नरेंद्र दाभोलकर

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    भ्रम और निरसन – नरेंद्र दाभोलकर

    भ्रम और निरसन

    नरेंद्र दाभोलकर

    नरेंद्र दाभोलकर का ज़‍िन्दगी के सारे चिन्तन और सामाजिक सुधारों में यही प्रयास था कि इंसान विवेकवादी बने। उनका किसी जाति-धर्म-वर्ण के प्रति विद्रोह नहीं था। लेकिन षड्यंत्रकारी राजनीति के चलते अपनी सत्ता की कुर्सियों, धर्माडम्बरी गढ़ों को बनाए रखने के लिए उन्हें हिन्दू विरोधी करार देने की कोशिश की गई और कट्टर हिन्दुओं के धार्मिक अन्धविश्वासों के चलते एक सुधारक का ख़ून किया गया।

    एक सामान्य बात बहुत अहम है, वह यह कि विवेकवादी बनने से हमारा लाभ होता है या हानि इसे सोचें। अगर हमें यह लगे कि हमारा लाभ होता है तो उस रास्ते पर चलें। दूसरी बात यह भी याद रखें कि धर्माडम्बरी, पाखंडी बाबा तथा झूठ का सहारा लेनेवाले व्यक्ति का अविवेक उसे स्वार्थी बनाकर निजी लाभ का मार्ग बता देता है, अर्थात् उसमें उसका लाभ होता है और उसकी नज़र से उस लाभ को पाना सही भी लगता है; लेकिन उसके पाखंड, झूठ के झाँसे से हमें हमारा विवेक बचा सकता है।

    ‘भ्रम और निरसन’ किताब इसी विवेकवाद को पुख्ता करती है। हमारी आँखों को खोल देती है और हमें लगने लगता है कि भाई आज तक हमने कितनी ग़लत धारणाओं के साथ ज़‍िन्दगी जी है। मन में पैदा होनेवाला यह अपराधबोध ही विवेकवादी रास्तों पर जाने की प्राथमिक पहल है।

    सोलह से पच्चीस की अवस्था में मनुष्य का मन एक तो श्रद्धाशील बन जाता है या बुद्धिवादी बन जाता है। बहुत सारे लोग समझौतावादी बन जाते हैं। इसीलिए अन्धविश्वास का त्याग करने के ज़रूरी प्रयास कॉलेजों के युवक-युवतियों में ही होने चाहिए। क्षण-प्रतिक्षण तांत्रिक, गुरु अथवा ईश्वर के पास जाने की आदत बन गई कि पुरुषार्थ ख़त्म हो जाता, यह उन्हें समझना चाहिए या समझाना पड़़ेगा। भारतीय जनमानस और देश को लग चुका अन्धविश्वास का यह खग्रास ग्रहण श्री नरेंद्र दाभोलकर जी के प्रयासों से थोड़ा-बहुत भी कम हो गया तो भी लाभप्रद हो सकता है। वैज्ञानिक खोजबीन अपनी चरमसीमा को छू रही है। ऐसे दौर में अन्धविश्वासों का चश्मा आँखों पर लगाकर लडख़ड़ाते क़दम उठाने में कौन सी अक्लमन्दी है?     —नारायण गणेश गोरे

    पृष्ठ-152 रु150

    150.00
  • Samoohavum Sasthra Avabodhavum സമൂഹവും ശാസ്ത്ര അവബോധവും

    സമൂഹവും ശാസ്ത്ര അവബോധവും – ഡോ നരേന്ദ്ര ധബോൽക്കർ

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    സമൂഹവും ശാസ്ത്ര അവബോധവും – ഡോ നരേന്ദ്ര ധബോൽക്കർ

    സമൂഹവും ശാസ്ത്ര അവബോധവും

     

    ഡോ നരേന്ദ്ര ധബോൽക്കർ

     

    അന്ധവിശ്വാസങ്ങൾക്കും അനാചാരങ്ങൾക്കും അനാചാരങ്ങൾക്കും മതമൗലികവാദത്തിനുമെതിരെ സമരോത്സുക യുക്തിവാദമതേതര ആശയപ്രചാരണത്തിൽ എന്നും നേതൃനിരയിലായിരുന്നു ഡോ. ധബോൽക്കർ. എന്നാൽ സാഹോദര്യത്തിന്റെ ശത്രുക്കളും രാജ്യദ്രോഹികളുമായ ഏതാനും ഹിന്ദുത്വഫാസിസ്റ്റുകൾ ധബോൽക്കറിനെ നിഷ്‌ക്കരുണം വധിക്കുകയാണുണ്ടായത്. അദ്ദേഹത്തിന്റെ ഈ സമാഹാരത്തിലെ ഓരോ ലേഖനവും ഏക്കാലത്തും പ്രസക്തിയുള്ളതാണ്.

     

    ‘മഹാരാഷ്ട്ര അന്ധശ്രദ്ധാനിർമൂലൻ സമിതി’ അഥവാ അന്ധവിശ്വാസ നിർമൂലന സമിതി എന്ന സംഘടയിലൂടെ മഹാരാഷ്ട്രയിലെ കുഗ്രാമങ്ങളിൽ പോലും യുക്തിചിന്തയുടെ വെള്ളിവെളിച്ചം എത്തിച്ച മഹാനായിരുന്നു നരേന്ദ്ര ധാബോൽക്കർ. ഈ സംഘടനയ്ക്ക് ഇന്നും മഹാരാഷ്ട്രയിലെമ്പാടും സജീവ സാന്നിദ്ധ്യവുമുണ്ട്.

    Dr Narendra Dhabolkar / Dabolkar / Dhabol / Samuhavum Sasthra Avabodhavum

    പേജ് 98 വില രൂ120

    120.00