Arundhati Roy: Books

Books by Arundhati Roy

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  • एक था डॉक्टर एक था संत - अरुन्धति रॉय

    एक था डॉक्टर एक था संत – अरुन्धति रॉय

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    एक था डॉक्टर एक था संत – अरुन्धति रॉय

    एक था डॉक्टर एक था संत

    अरुन्धति रॉय

    वर्तमान भारत में असमानता को समझने और उससे निपटने के लिए, अरुंधति रॉय ज़ोर दे कर कहती हैं कि हमें राजनीतिक विकास और एम.के. गांधी का प्रभाव, दोनों का ही परीक्षण करना होगा। सोचना होगा कि क्यों बी.आर. आंबेडकर द्वारा गांधी की लगभग दैवीय छवि को दी गई प्रबुद्ध चुनौती को भारत के कुलीन वर्ग द्वारा दबा दिया गया। राय के विश्लेषण में, हम देखते हैं कि न्याय के लिए आंबेडकर की लड़ाई, जाति को सुदृढ़ करनेवाली नीतियों के पक्ष में, व्यवस्थित रूप से दरकिनार कर दी गई, जिसका परिणाम है वर्तमान भारतीय राष्ट्र जो आज ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र है, विश्वस्तर पर शक्तिशाली है, लेकिन आज भी जो जाति व्यवस्था में आकंठ डूबा है।

    पृष्ठ-184 रु199

    199.00
  • आज़ादी – अरुन्धति रॉय

    250.00
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    आज़ादी – अरुन्धति रॉय

    आज़ादी
    अरुन्धति रॉय

    आज़ादी—कश्मीर में आज़ादी के संघर्ष का नारा है, जिससे कश्मीरी उस चीज़ की मुख़ालफ़त करते हैं जिसे वे भारतीय क़ब्ज़े के रूप में देखते हैं। विडम्बना ही है कि यह भारत की सड़कों पर हिन्दू राष्ट्रवाद की परियोजना की मुख़ालफ़त करनेवाले लाखों अवाम का नारा भी बन गया। आज़ादी की इन दोनों पुकारों के बीच क्या है–क्या यह एक दरार है या एक पुल है? इस सवाल के जवाब पर ग़ौर करने का वक़्त अभी आया ही था कि सड़कें ख़ामोश हो गईं। सिर्फ़ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की सड़कें। कोविड–19 के साथ आई आज़ादी की एक और समझ, जो कहीं ख़ौफ़नाक थी। इसने मुल्कों के बीच सरहदों को बेमानी बना दिया, सारी की सारी आबादियों को क़ैद कर दिया और आधुनिक दुनिया को इस तरह ठहराव पर ला दिया जैसा कभी नहीं देखा गया था। रोमांचित कर देनेवाले इन लेखों में अरुंधति रॉय एक चुनौती देती हैं कि हम दुनिया में बढ़ती जा रही तानाशाही के दौर में आज़ादी के मायनों पर ग़ौर करें। इन लेखों में, हमारे बेचैन कर देनेवाले इस वक़्त में निजी और सार्वजनिक ज़ुबानों पर बात की गई है, बात की गई है क़िस्सागोई और नए सपनों की ज़रूरत की। रॉय के मुताबिक़, महामारी एक नई दुनिया की दहलीज़ है। जहाँ आज यह महामारी बीमारियाँ और तबाही लेकर आई है, वहीं यह एक नई क़िस्म की इंसानियत के लिए दावत भी है। यह एक मौक़ा है कि हम एक नई दुनिया का सपना देख सकें। आज के समय में जब समाज को बाँटने और नफ़रत की राजनीति मज़बूत हो रही है, ऐसे में लेखिका विचार करती हैं कि क़िस्सागोई और भाषा की भूमिका कितनी अहम है। किताब का ख़ास हिस्सा नए नागरिकता क़ानून (सीएए) और एनपीआर-एनसीआर के बारे में है, और इनके ख़िलाफ़ आंदोलनों के बारे में भी। लेखिका ने इस राजनीति और बँटे हुए समाज में कोरोना महामारी के मायने और प्रभाव को एक गहरी नज़र से देखने की कोशिश की है। एक उपन्यासकार के रूप में लेखिका ने अपने दोनों उपन्यासों को सोचने और उन्हें लिखने की प्रक्रिया पर विस्तार से लिखा है। साथ ही एक निबंध लेखक के रूप में अपने काम पर भी एक निगाह डाली है। अनुवाद ऐसा जैसे किताब मूल हिन्दी में लिखी गई हो।.

    पृष्ठ-248 रु250

    250.00
  • एक था डॉक्टर एक था संत – अरुन्धति रॉय

    199.00
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    एक था डॉक्टर एक था संत – अरुन्धति रॉय

    एक था डॉक्टर एक था संत
    अरुन्धति रॉय

    वर्तमान भारत में असमानता को समझने और उससे निपटने के लिए, अरुंधति रॉय ज़ोर दे कर कहती हैं कि हमें राजनीतिक विकास और एम.के. गांधी का प्रभाव, दोनों का ही परीक्षण करना होगा। सोचना होगा कि क्यों बी.आर. आंबेडकर द्वारा गांधी की लगभग दैवीय छवि को दी गई प्रबुद्ध चुनौती को भारत के कुलीन वर्ग द्वारा दबा दिया गया। राय के विश्लेषण में, हम देखते हैं कि न्याय के लिए आंबेडकर की लड़ाई, जाति को सुदृढ़ करनेवाली नीतियों के पक्ष में, व्यवस्थित रूप से दरकिनार कर दी गई, जिसका परिणाम है वर्तमान भारतीय राष्ट्र जो आज ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र है, विश्वस्तर पर शक्तिशाली है, लेकिन आज भी जो जाति व्यवस्था में आकंठ डूबा है।

    पृष्ठ-184 रु199

    199.00
  • आहत देश – अरुन्धति रॉय

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    आहत देश – अरुन्धति रॉय

    आहत देश
    अरुन्धति रॉय

    ‘‘वह जंगल जो दण्डकारण्य के नाम से जाना जाता था और जो पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ से लेकर आन्ध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों को समेटता हुआ महाराष्ट्र तक फैला है, लाखों आदिवासियों का घर है। मीडिया ने इसे ‘लाल गलियारा’ या ‘माओवादी गलियारा’ कहना शुरू कर दिया है। लेकिन इसे उतने ही सटीक ढंग से ‘अनुबन्ध गलियारा’ कहा जा सकता है। इससे रत्ती-भर फ़र्क़ नहीं पड़ता कि संविधान की पाँचवीं सूची में आदिवासी लोगों के संरक्षण का प्रावधान है और उनकी भूमि के अधिग्रहण पर पाबन्दी लगाई गई है। लगता यही है कि वह धारा वहाँ महज़ संविधान की शोभा बढ़ाने के लिए रखी गई है—थोड़ा-सा मिस्सी-ग़ाज़ा, लिपस्टिक-काजल। अनगिनत निगम, छोटे अनजाने व्यापारी ही नहीं, दुनिया के दैत्याकार-से-दैत्याकार इस्पात और खनन निगम—मित्तल, जिन्दल, टाटा, एस्सार, पॉस्को, रिओ टिंटो, बीएचपी बिलिटन और हाँ, वेदान्त भी—आदिवासियों के घर-बार को हड़पने की फ़िराक़ में हैं।

    हर पहाड़ी, हर नदी और हर जंगल के लिए समझौता हो गया है। हम अकल्पनीय स्तर पर व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय कायाकल्प की बात कर रहे हैं। और इसमें से ज़्यादातर गुप्त है। मुझे क़तई नहीं लगता कि दुनिया के सबसे पुराने और दिव्य जंगल, परिवेश और आदिम समुदाय को नष्ट करने के लिए जो परियोजनाएँ शुरू हुई हैं, उनकी चर्चा भी कोपेनहेगेन में होनेवाले ‘जलवायु परिवर्तन सम्मेलन’ में होगी। माओवादी हिंसा की भयावह कहानियाँ खोजनेवाले (और न मिलने पर उन्हें गढ़ लेनेवाले) ख़बरिया चैनल लगता है, क़िस्से के इस पक्ष में बिलकुल दिलचस्पी नहीं रखते। मुझे अचरज है, ऐसा क्यों?’’

    युद्ध, भारत की सीमाओं से चलकर देश के हृदय-स्थल में मौजूद जंगलों तक फैल चुका है। भारत की सर्वाधिक प्रतिष्ठासम्पन्न लेखिका द्वारा लिखित यह पुस्तक ‘आहत देश’ कुशाग्र विश्लेषण और रिपोर्टों के संयोजन द्वारा उभरती हुई वैश्विक महाशक्तियों के समय में प्रगति और विकास का परीक्षण करती है और आधुनिक सभ्यता को लेकर कुछ मूलभूत सवाल उठाती है।

    पृष्ठ-183 रु295

     

    295.00
  • Azadi

    Azadi

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    Azadi

    By
    Arundhati Roy

     

    From the best-selling author of My Seditious Heart and the Ministry of Utmost Happiness, a new and pressing dispatch from the heart of the crowd and the solitude of the writer’s desk.

    The chant of “Azadi!”—Urdu for “Freedom!”—is the slogan of the freedom struggle in Kashmir against what Kashmiris see as the Indian Occupation. Ironically, it also became the chant of millions on the streets of India against the project of Hindu Nationalism.

    Even as Arundhati Roy began to ask what lay between these two calls for Freedom—a chasm or a bridge?—the streets fell silent. Not only in India, but all over the world. The coronavirus brought with it another, more terrible understanding of Azadi, making a nonsense of international borders, incarcerating whole populations, and bringing the modern world to a halt like nothing else ever could.

    In this series of electrifying essays, Arundhati Roy challenges us to reflect on the meaning of freedom in a world of growing authoritarianism.

    The essays include meditations on language, public as well as private, and on the role of fiction and alternative imaginations in these disturbing times.

    The pandemic, she says, is a portal between one world and another. For all the illness and devastation it has left in its wake, it is an invitation to the human race, an opportunity, to imagine another world.

     

    Readers here may be more surprised by the ferocity of her criticism of India’s governing party, the BJP, and the Prime Minister Narendra Modi. The party is, she says, the political wing of RSS (Rashtriya Swayamsevak Sangh), the high-caste Hindu movement founded in 1925. On Independence in 1947 India was declared to be a secular socialist republic, but the ideals of the Congress Party and Jawaharlal Nehru have been betrayed and cast aside. Roy does not hesitate to describe the RSS and the present government and prime minister as fascist. “India,” the RSS declares is “a Hindu nation; this is non- negotiable.” For its hundred and more million Muslims, the choice is “Pakistan or the graveyard.” Roy compares the BJP’s Citizen Amendment Act and its National Register of Citizens to Hitler’s Nuremberg Laws which decreed who was, and who could not be, German. In its discrimination between racial and religious groups, and its rigid upholding of the caste system, the BJP makes India today look depressingly like apartheid South Africa. Meanwhile its ruthless imposition of martial law in the disputed province of Kashmir – a running sore ever since independence – recalls Saddam Hussein’s treatment of the Kurds. Roy remarks that “while many countries are dealing with a refugee crisis, the Indian Government is turning citizens into refugees.” Here, she says, is “a continent trying to shrink itself into a country. Not even a country, but a province. A primitive ethno-religious province.”

    Her indignation is searing and indeed there seems to be little to be said for Modi, the BJP and the RSS. In their narrow and violent sectarianism, they represent a denial of the liberal principles on which the republic was founded.

     

    248 pages

    499.00
  • Athyanandhathinte Dhaivavrithi അത്യാനന്ദത്തിന്റെ ദൈവവൃത്തി - അരുന്ധതി റോയി

    അത്യാനന്ദത്തിന്റെ ദൈവവൃത്തി – അരുന്ധതി റോയി

    499.00
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    അത്യാനന്ദത്തിന്റെ ദൈവവൃത്തി – അരുന്ധതി റോയി

    അത്യാനന്ദത്തിന്റെ ദൈവവൃത്തി

     

    അരുന്ധതി റോയി

    അത്യാനന്ദത്തിന്റെ ദൈവവൃത്തി ഒരേസമയംതന്നെ വേദനിപ്പിക്കുന്ന ഒരു പ്രണയകഥയും നിര്‍ണ്ണായകമായ ഒരു പ്രതിഷേധവുമാണ്. മൃദുമന്ത്രണത്തിലൂടെയും അലര്‍ച്ചയിലൂടെയും കണ്ണീരിലൂടെയും പൊട്ടിച്ചിരികളിലൂടെയും ആ കഥ നമ്മള്‍ക്കു മുന്നില്‍ അവതരിപ്പിക്കപ്പെടുന്നു. തങ്ങള്‍ ജീവിച്ച ലോകത്താല്‍ തകര്‍ക്കപ്പെട്ടവരും പിന്നീട് രക്ഷപ്പെട്ട് പ്രത്യാശയുടെ പിന്‍ബലത്താല്‍ സ്വയം വീണ്ടെടുത്തവരുമാണ് ഇതിലെ നായകര്‍. അക്കാരണം കൊണ്ടുതന്നെ അവര്‍ ദൃഢതയുള്ളവരും ദുര്‍ബ്ബലരുമാണ്, കീഴടങ്ങാന്‍ ഒരിക്കലും തയ്യാറുമല്ല. ഈ ചേതോഹരവും പ്രൗഢവുമായ കൃതി, ഒരു നോവലിന് എന്താണു സാധിക്കുന്നതെന്നതിനെ പുനഃനിര്‍മ്മിക്കുകയാണ്. കൂടാതെ ഓരോ താളും അരുന്ധതി റോയി എന്ന അനുഗൃഹീത എഴുത്തുകാരിയുടെ അത്ഭുതകരമായ രചനാവൈഭവത്തിന്റെ നേര്‍സാക്ഷ്യവുമാകുന്നു. വിവര്‍ത്തനം- ജോണി എം.എല്‍

    Arundhathi Roy / Arundathy Roi

    പേജ് 488 വില രൂ499

    499.00
  • Njan Desabhakthayalla ഞാൻ ദേശഭക്തയല്ല - അരുന്ധതി റോയി

    ഞാൻ ദേശഭക്തയല്ല – അരുന്ധതി റോയി

    150.00
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    ഞാൻ ദേശഭക്തയല്ല – അരുന്ധതി റോയി

    ഞാൻ ദേശഭക്തയല്ല

     

    അരുന്ധതി റോയി

    ദേശീയത, മാവോയിസം, ഗാന്ധി, അംബേദ്കർ, ജീവിതം, എഴുത്ത് എന്നിവയെക്കുറിച്ച് അരുന്ധതി റോയി സംസാരിക്കുന്നു. അരുന്ധതി റോയിയുടെ എഴുത്തും ജീവിതവും ്അടയാളപ്പെടുത്തുന്ന സംഭാഷണങ്ങളുടെ പുസ്തകം.

    എഡിറ്റർ – ഇ കെ പ്രേംകുമാർ

    Arundhathi Roy / Arundhati Royi

    പേജ് 152 വില രൂ150

    150.00
  • Mrugarupam - Arunthathi Roy മൃഗരൂപം - അരുന്ധതി റോയ്

    മൃഗരൂപം – അരുന്ധതി റോയ്

    190.00
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    മൃഗരൂപം – അരുന്ധതി റോയ്

    മൃഗരൂപം

    അരുന്ധതി റോയ്

    കലയെക്കുറിച്ചും രാഷ്ട്രീയത്തെക്കുറിച്ചും വേറിട്ട കാഴ്ചപ്പാടുകൾ. നർമദാ ബച്ചാവോ ആന്ദോളൻ, പരിസ്ഥിതിനാശം, കുടിയൊഴിപ്പിക്കുന്ന ആദിവാസികൾ, കോളനിവൽക്കരണം, അമേരിക്ക എന്നിവയെക്കുറിച്ചുള്ള നിലപാടുകളും വ്യക്തിജീവിതത്തെക്കുറിച്ചുള്ള തുറന്നുപറച്ചിലുകളും അടങ്ങുന്ന അരുന്ധതി റോയിയുടെ അഭിമുഖങ്ങൾ ഉൾക്കൊള്ളുന്ന കൃതി.

    ML / Malayalam / Arundhati Roy / Translation

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    190.00