हिंदी भाषा का इतिहास

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  • हिन्दी भाषा का विकास – गोपाल राय

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    हिन्दी भाषा का विकास – गोपाल राय

    हिन्दी भाषा का विकास

    हिन्दी भाषा का विकास
    गोपाल राय

    यह पुस्तक संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग के अतिरिक्त विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के लिए भी अत्यन्‍त उपयोगी है। पुस्तक IAS/PCS के हिन्‍दी साहित्य प्रथम प्रश्न-पत्र(वैकल्पिक विषय) के लिए अत्यन्‍त महत्‍त्‍वपूर्ण है। हिन्‍दी भाषा एवं नागरी लिपि के इतिहास सम्‍बन्‍धी प्रत्येक बिन्‍दु का सुव्यवस्थित अध्ययन इस किताब में शामिल है।

    पृष्ठ-288 रु199

    199.00
  • हिन्दी साहित्य : एक सरल परिचय – प्रो. डॉ. सुरैय्या शेख़

    125.00
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    हिन्दी साहित्य : एक सरल परिचय – प्रो. डॉ. सुरैय्या शेख़

    हिन्दी साहित्य : एक सरल परिचय
    प्रो. डॉ. सुरैय्या शेख़

    इतिहास ग्रन्‍थों के अतिरिक्त हिन्दी साहित्य के विभिन्न कालखंडों, काल-रूपों और धाराओं पर अनेक शोध-प्रबन्‍ध एवं समीक्षात्मक ग्रन्‍थ प्रकाश में आए हैं।

    इनमें साहित्य के अनेक अज्ञात तथ्यों और अनिर्णीत प्रश्नों को नवीन दृष्टिकोण से नवालोक में प्रस्तुत किया गया है, किन्तु हिन्दी अनुसन्‍धान-जगत के इन नवीन निष्कर्षों और परिणामों का अतीव सतर्कतापूर्वक समन्वय एवं समाहितीकरण इतिहास-लेखन की दिशा में अभी शेष है। अतः नवीन शोध-परिणामों और विकसित साहित्य-चेतना के आलोक में हिन्‍दी साहित्य के इतिहास का पुनर्गठन और लेखन आवश्यक है।

    निस्सन्‍देह आज हिन्दी साहित्य के इतिहास में सम्‍बन्धित शताब्दिक पुस्तकें उपलब्ध हैं, किन्तु अभी तक इस दिशा में उचित व सन्तोषजनक प्रगति नहीं हुई है। हमने उस अभाव को दृष्टि में रखकर इस ग्रन्‍थ का प्रणयन किया है।

    पृष्ठ-216 रु125

    125.00
  • मानवदेह और हमारी देह्भाषाएं – रमेश कुन्तल मेघ

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    मानवदेह और हमारी देह्भाषाएं – रमेश कुन्तल मेघ

    मानवदेह और हमारी देह्भाषाएं
    रमेश कुन्तल मेघ

    यह एक विलक्षण संहिता है जो मानवदेह तथा अनेकानेक देहभाषाओं के विश्वकोश जैसी है। इसे अध्ययन-कक्ष, शृंगार-मेज़, ज्ञान-परिसंवाद तथा रात्रि-शय्या में बेधड़क पास एवं साथ में रखना वांछनीय होगा। यह अद्यतन ‘देह धुरीण विश्वकोश’ अर्थात् अकुंठ ‘बॉडी इनसाइक्लोपीडिया’ है।

    पन्द्रह वर्षों की इतस्ततः अन्वीक्षा-अन्वेषण-अनुप्रयोग से यह रची गई है। इसके लिए ही कृती-आलोचिन्तक को निजी तौर पर अमेरिका में मिशिगन (डेट्राइट) में अपनी बेटी मधुछंदा के यहाँ प्रवास करना पड़ा था।

    इसका प्रत्येक पन्ना, रेखाचित्र, चित्र चार्ट सबूत हैं कि ‘मानवदेह और हमारी देह्भाषाएँ’ अन्तर-ज्ञानानुशासनात्मक उपागम द्वारा समाजविज्ञानों, कला, साहित्य, समाजेतिहास आदि से संयुक्त ‘सांस्कृतिक-पैटर्न’ का भी एक प्रदर्श है।

    यहाँ सिरजनहार की आलोचिन्तना की दावेदारी की जाँच तथा देनदारी का इम्तहान भी होगा।

    तथापि इसके निर्णायक तो आप ही हैं।

    यह ‘ग्रन्थ’ क्षयिष्णु कुंठाओं, रूढ़ वर्जनाओं-अधोगामी पूर्वग्रहों के विरुद्ध, अतः उनसे विमुक्त होकर, शालीनता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा आम आदमी की बेहतर भौतिक ज़िन्दगानी की समझदारी से प्रतिबद्ध है।

    इसमें भारत, रूस, अमेरिका, रोम, मेक्सिको, इजिप्त के कला-एलबमों तथा ग्रन्थाकारों और म्यूज़ियमों

    का भी नायाब इस्तेमाल हुआ है।

    यह दस से भी ज़्यादा वर्षों की तैयारी द्वारा अमेरिका-प्रवास में सम्पन्न हुआ है। लक्ष्य है : असंख्य-बहुविध प्रासंगिक सूचनाएँ देना, ज्ञान के बहुआयामी-अल्पज्ञात क्षितिजों को खोजना, तथा मानवदेह और उसकी विविध देहभाषाओं का वर्गीकरण, शिक्षण-प्रशिक्षण, तथा उदारीकरण करते चलना। अथच।

    सर्वांत में अपने ही देश में उपेक्षित जनवादी राजभाषा हिन्दी को 21वीं शताब्दी की कलहंसनी बनाकर स्वदेश में देशकाल के पंखों द्वारा कालोत्तीर्ण उड़ानें देना।

    सो, यह ग्रन्थ भारत एवं विश्व की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक हंसझील-नीड़ के मुझ जैसे सादे बन्दे का हंसगान भी है। अगर आपको पसन्द आए तो इसे एक ‘आधुनिक देहभागवत’ भी कह लें। तो आपकी राय का दिन-प्रतिदिन इन्तज़ार रहेगा—ऐसे विमर्श में!

    हीरामन और नीलतारा के संकल्प से।

    पृष्ठ- 767 रु2500

    2,500.00